Tuesday, May 25, 2010
त्रिविचार
“लल्ला” को आजकल मैंनेजमेंट का भूत सबार हो गया । कहने लगे कि Gilli-Stick पर मैनेजमेंट का एक कोर्स करके आयेंगे । मैने पूछ दिया
-“Gilli-Stick” क्या है
जबाब मिला “ यू डांट नो !(मुझे अपराधीबोध कराते हुए) इट्स ए वंडरफुल स्ट्रेस रिलीविंग फिनोमिना ॥
-हो सकता है कि होता हो लेकिन फिलहाल मुझे नहीं पता ....मैने पूछ लिया
ओ.के !! फार दिस लेट मी ओपेन माई माई लैपी !! ---लल्ला बोले
लल्ला ने फटाफट अपना बैग खोला और थोड़ी ही देर में मेरे सामने 8 slides का एक प्रजेंटेशन आ गया ।
8 स्लाईड्स दिखाने और 35 मिनट मेरी सहनशक्ति की परीक्षा लेने के बाद “लल्ला” बोले
Actually it’s a Game and Rural Class of India calls it “गुल्ली-डंडा” ॥
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2. प्रबंधक गुरू
भारत के प्रसिद्द प्रबंधन संस्थान के एक गुरू जी का सानिध्य प्राप्त हुआ। इसमें कोई संदेह नही कि यह काफी प्रेरणादायक और सीखने योग्य था । लेकिन कभी-2 कुछ बातें मुझ जैसे गांव-गंवारू को बहुत ही खराब लगती है यह मेरी कमजोरी भी हो सकती है ।
मिस्टर चट्टोपाध्याय ने शायद ही किसी इटालियन या अंग्रेज लेखक हो न पढा हो । शायद यही कारण है कि वह इतने प्रतिष्ठित गुरू हैं ।
वो बोले
--जानते हो पवन ! इंडिया और जापान में क्या अंतर है ?
ऐसे प्रश्नो को उत्तर “हाँ” में नही दिया जा सकता
मैने कहा “नहीं”
चटोपाध्याय जी बोले
“ जापान में जब बच्चे की मां चलना सिखाती है तो बच्चे के सामने खड़ी होती है । बच्चे को सदा यह अहसास रहता है “मां” तक पहुंचना उसका “लक्ष्य” है और जब बच्चा माँ तक पहुंच जाता है तो माँ फिर 4 कदम दूर खड़ी हो जाती है ।“
बच्चा गिरता संभलता फिर गिरता फिर संभलता एक दिन चलना सीख जाता है।
और एक हम भारतीय हैं जिनकी मां बच्चों को अपने पैरों पर खडा कर पीछे से पूरा support देती हैं बच्चे को जीवन भर यही लगता है कि वह तो गिरेगा ही नही क्योंकि मां बाप सहारा बने हुए हैं ।
इसीलिए एक हमारी Economy है और एक जापान की !!
गुरूजी शायद तमाम अंग्रेजों की किताबों के बीच में प्रेमचंद्र के हामिद को भूल गये जो भारत का बच्चा तमाम खिलौनो को छोड़्कर दादी के जलते हुए हाथो के लिए 3 पैसे का लोहे का चिमटा लेकर आता है ।
काश कि मैनेंजमेंट गुरूओं ने यह लाईनें भी पढी होती
“अब मियाँ हामिद का हाल सुनिए। अमीना उसकी आवाज़ सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठा कर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देख कर वह चौंकी।
' यह चिमटा कहाँ था ?'
' मैंने मोल लिया है। '
' कै पैसे में ?'
' तीन पैसे दिये। '
अमीना ने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया न पिया। लाया क्या, चिमटा ! सारे मेले में तुझे और कोई चीज़ न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया ?
हामिद ने अपराधी-भाव से कहा --- तुम्हारी उँगिलयाँ तवे से जल जाती थीं ; इसलिए मैंने उसे लिया।
बुढ़िया का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था, ख़ूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना त्याग, कितना सद्भाव और कितना विवेक है !दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देख कर इसका मन कितना ललचाया होगा ! इतना ज़ब्त इससे हुआ कैसे ? वहाँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही।
अमीना का मन गद्गद हो गया।
और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद के इस चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गयी। वह रोने लगी। दामन फैला कर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता !” *************************************************************************************************
3.Negotiation Skills
मेरा एक दोस्त दिल्ली के पालिका बाजार से सामान खरीद कर भी खुश रहता है । यह वह जगह है जहाँ आपको हमेशा लगेगा कि आपको ठग लिया गया ।
मै उसके साथ उस दिन टोपी खरीदने गया ।
दुकानदार बोला – 300 रूपये
वो बोला – 30 रूपये
दुकानदार हंस दिया ..बोला खरीदने आये हो या मजाक उड़ाने?
बो बोला – खरीदने
दुकानदार बोला तो फिर लाओ 30 रुपये !
टोपी तीस रूपये में खरीद ली गयी ।
ऐसे व्यक्ति को उसकी कंपनी के लोग कहते है 3 लाख रूपये का Negotiation Skill पर Course करके आओ ..
“सो दैट यू कैन इम्प्रूव इट !!"
Saturday, May 01, 2010
मूर्ख विज्ञान

एक विज्ञान की
किताब में
पढा ।
हम सब
एक ही हैं
गोरिल्ला चिप्पैंजी
ओरंग, उटांग
के वंशज ॥
उसमें यह
भी कहा गया
कि
काकेशायड
मंगोलायड
या निग्रोयाय़ड
एक ही हैं
कोई समान तो
कोई संकर बीजों की
उत्पति !!
यह तो प्रकृति है
कि कोई गोरा हो गया
तो कोई काला...
संवेदना ,भावुकता, ममता ,खुशी और आंसू
एक ही है ।
मूर्ख है ये सब विज्ञानी
पूर्व जन्म के पाप नहीं समझते ॥
Thursday, March 04, 2010
कुछ गलतफहमियां
दीदी के बालों में बांधने वाली रबड़ को पेंसिल के पीछे बांधकर, लिखे हुए को मिटाने की कोशिश की थी यह सोचकर कि लिखा हुआ बिल्कुल साफ हो जायेगा ।
किताबों के पन्नों के बीच में विद्या के पत्तो को भी रखा ,यह सोचकर कि अछ्छे नम्बर आयेंगे ।
कड़ी सर्दियों में ठंडे पानी से नहाकर , प्रात: स्मरण मंत्र बोलकर स्कूल गये । यह सोचकर कि आज गणित के मास्टर साहब को बुखार आ जायेगा ।
पहला पन्ना राम का, अगला पन्ना काम का ....जुलाई में आने वाली नईं कापियों को सुन्दर रखने की कोशिश की ,यह सोचकर कि विद्या देवी है ,खुश होगी ।
पैरामीशियम, अमीबा को तालाब के पानी से इकठ्ठा ,इंक की शीशी में डाला और उसमे हर दिन डाली सड़ी गली चीजें ,यह सोच कर कि कभी तो वो बड़े होंगे ।
कालेज की अगली सीट पर बैठने वाली उस लम्बे बालों वाली लड़्की को सोचकर लिख दी एक कविता ,यह सोचकर कि एक न एक दिन पीछे की सीट पर बैठने वाले उस बुद्दू से वह Impress होगी
कल उसको India के सबसे बेहतर Hospital लेकर गया , यह सोचा था कि वो कुछ और दिन मुझे देखकर मुस्कुरायेगी...........
Friday, February 12, 2010
पागल सपनें
कमाती नहीं है
घर में पड़े हुए
जूठे बर्तनो को रगड़्ती है ....
पगली है सोचती है नये हो जायेंगे ॥
पिताजी
दिहाड़ी मजदूर है
कमाते हैं
घर में पड़े हुए
झूठे हो चुके बच्चो को रगड़्ते है .....
पागल हैं सोचते हैं उनसे बेहतर हो जायेंगे ॥
Sunday, January 31, 2010
दौडौ ! पीठ पर अपने अपने घरों का बोझ लेकर!!
26 जनवरी की सुबह ने मुझे भी मोहम्मद रफी और महेंद्र कपूर (क्रमश: हिन्दू,मुस्लिम) के गानों एवं “मिले सुर मेरा तुम्हारा” जैसी धुन ने देश-भक्ति की भावना से ओत-प्रोत कर दिया और मै एक बार फिर भारतीय होने पर गर्व करने ही वाला था कि बाल ठाकरे साहब ने मुझे पुनर्विचार करने पर मजबूर कर दिया । मुझे अभी तक यह समझ नहीं आ पा रहा कि कहीं उन्हे “उत्तर”- North शब्द से ही तो चिढ नहीं है और पकिस्तान तथा उत्तर भारतीय दोनो को इसलिए एक साथ “सामना” के द्वारा लपेटे में ले रहें हैं । उम्मीद है कि मै अभी तक इतना महत्वपूर्ण नहीं हुआ कि शिवसेना मेरे इस वक्तव्य से क्रोधित होकर मेरा पुतला फूंके ।अगर वह ऐसा करने को उत्सुक हैं तो मेरा शरीर किसी भी पुतले से न केवल बेहतर जल सकता है बल्कि मीडिया प्रचार के लिए भी बेहतर है ।
27 जनवरी से मुझे माइक्रोसाफ्ट की एक ट्रेनिंग में भाग लेना था । दिल्ली में कालिदीं कुंज और अपोलो हास्पिटल के सामने कुछ रेल की पटरियां है जो दिल्ली को आगरा ,मुंबई जैसे शहरों से जोड़्ती है।
एक और चित्र यह है कि यही रेळ की पटरियां इंसान को उसकी भूख मिटाने के साधन से विभाजित करती है। रेल की पटरियों के इस ओर मदनपुन खादर/जसोला विहार/कालिन्दी कुंज जैसी जगह है जहां निम्नवर्गीय ,मध्यमवर्गीय भारत बसता है जो हर रोज पटरियों के उस पार ओखला इंडस्ट्रियल एरिया में , उच्चवर्ग द्वारा स्थापित व्यवसायों में अपनी आजीविका ढूढने के लिए तेजी से आती रेलगाडियों के आगे दौड़ लगाता है ।
मैने नये होने के कारण एक को टोक दिया “ अरे अंकल ! मरोगे क्या? तुम्हे नहीं पता “राजधानी किस रफ्तार से आती है” ।
अधेड़ तपाक से बोला –
-किस “राजधानी” की रफ्तार से बचना है? ट्रेन वाली या शहर वाली ?
2.
टाटा की लो-फ्लोर बसों में पहली बार बैठा , यह बाहर से देखने में काफी बेहतरीन है। उ.प्र सरकार नें नीले रंग से इसको अलग रखा इसके लिए मै बहनजी का शुक्रिया अदा करता हूँ । यधपि मुझे हर भारतीय की तरह नीले रंग से प्यार है लेकिन इसकी अधिकता इसके महत्व को कम करती जा रही थी । नोएडा के सेक्टर-37 से आप लगभग हर इलाके की बस ले सकते हैं ।
थोड़ा इंतजार के बाद हल्के हरे रंग की डिजिटल सिग्नल युक्त बस आ गई । कुछ छड़ के लिए तो लगा कि दरवाजा खुलते ही एक खूबसूरत सी बस-होस्टेज़ स्कार्फ और मिनी स्कर्ट में स्वागत करेगी , लेकिन यथार्थ कुछ ही समय में सामने आ गया।
ओ अकबर !!! कां कु जाबेगा ???? 37-38 साल के कंडक्टर ने हरियाणवी भाषा के सबसे सभ्य शब्दों का प्रयोग करते हुए पूछा ।
जी मुझे सरिता बिहार तक जाना है !
तो खुद से चढेगा या बाप्पू आबेगा चढ़ाने ........??
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मुर्गे जब बाजार में बिकने जाते हैं तो मुर्गी-पालन करने वाला इंसान उन्हे एक जालीदार टोकरी में बंद करता है ।उस छोटी सी टोकरी में मुर्गे , एक दूसरे से लगभग चिपके हुए , अंश भर की जगह न होने के कारण सिर तक न घुमा सकने वाले वह सब अत्यंत शांत होते हैं । शायद उनको अपनी मौत का अंदाजा होता हो ।
सुबह-शाम पब्लिक ट्रांसपोर्ट से प्राइवेट कम्पनियों में काम पर आने जाने वाले लोगों में भी न जाने क्यूं ऐसी ही “निशब्ददता” पाने लगा हूँ ।
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पहले
सिगरेट पिलाई
कश दिया ,
कुछ रगींन सा .....
फिर..
खूब सारा शोर मचा दिया कानों में
मुझे भी मजा आने लगा था ।
मेरे घर के कोने पर
अप्सरायें जो नाचने लगी थी ।
क्या पता था कि खोखला हो रहा हूँ ।।
मेरे जैसे
खूब तैयार किए
फिर जब अस्थमा, टी.बी, से लबरेज हुआ
तब कहा
अब “दौडौ ! पीठ पर अपने अपने घरों का बोझ लेकर !
वो तो एक माँ है
जो अभी भी,
अलमुनियम के टिफ़िन में
बूढी हुई सब्जियाँ
परोस देती है और
कहती है
बेटा ठीक से खाना !!!
Sunday, January 17, 2010
राजनीतिशास्त्र और सूचना प्रौद्दोगिकी: (गूगल-चीन विवाद)
विश्व के राजनीतिक पटल पर प्रौधोगिकी ,वह भी विशेष रूप से सूचना प्रौधोगिकी इतना विशिष्ट प्रभाव छोड़ेगी यह शायद समकालीन राजनीतिक चिंतको ने भी नहीं सोचा होगा । 1917 की रूस की क्रांति के पश्चान पूरा विश्व 2 भागों में विभाजित हो गया था ,एक ओर विश्व के उदारवादी चिंतक लोकतंत्र की अवधारणा और व्यक्तिगत स्वतंत्र्ता का समर्थन करते हुए बाजार की मुक्त स्पर्धा का समर्थन करते गये और उसका तत्कालीन प्रभाव वैश्वीकरण तथा सम्पूर्ण विश्व एक है,और सभी सकारात्मक रूप से स्वतंत्र है ... इस अवधारणा के रूप में सामने आया ।
वहीं दूसरी ओर मार्क्स के समर्थक साम्यवाद की अवस्था में ही लोकतंत्र की धारणा का समर्थन करते हैं । उनका कहना है कि वास्तविक लोकतंत्र तभी मिलता है जब साम्यवाद होगा इसके बिना लोकतंत्र छ्लावा मात्र है । यहां यह बताना आवश्यक है कि साम्यवस्था मार्क्स का स्वप्न मात्र है जिसमे समाज का हर व्यक्ति क्षमता के अनुसार कार्य करता है और आवश्यक्ता के अनुरूप पाता है। साम्यवस्था से ठीक पहले की अवस्था समाजवादी अवस्था या सर्वहारा की तानाशाही के नाम से जानी जाते है जिसमें राजा /सरकार के ही हाथों में राज्य के सभी संशाधन होते है। विचारधारा के समर्थकों का कहना है कि जनता इतनी सक्षम नहीं है कि वह दूरगामी साम्यवाद को समझ सके। यही कारण है कि कम्युनिष्ट विचारक व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्व नहीं देते । वर्तमान में “चीन” प्रशासन शिक्षा, समाचार पत्र , विचारों की अभिव्यक्ति,आदि पर नियंत्रण रखता है परंतु सूचना प्रौधोगिकी के वर्तमान उत्कर्ष यथा गूगल,ब्लाग , Orkut, विकीपीडिया आदि धीरे धीरे चीन के कम्युनिष्ट स्वरूप को ही नही बल्कि वहां की संस्कृति को भी चुनौती देते जा रहे हैं ।
चीन में कार्यरत विश्व मानव अधिकार आयोग के कार्यकर्ताओं के ई-मेल लगातार हैक किये जा रहे हैं । इंटरनेट सर्च कंपनी गूगल ने कहा है कि वो चीन में अपना कामकाज समेट सकती है क्योंकि चीनी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के ईमेल कथित तौर पर हैक किये जा रहे हैं। व्यक्तिगत इंटरनेट Accounts को हैक कर प्राइवेसी (Privacy) को समाप्त किया जा चुका है । गूगल के चीनी भाषा के संस्करण का सर्च क्रम (Order) चीनी सरकार के मौन समर्थन में बदला जा चुका है ।
अमेरिकी इंटरनेट कंपनी गूगल के चीन सरकार के साथ चल रहे गंभीर विवाद से ओबामा प्रशासन ने चीन को औपचारिक रूप से डिमार्शे (राजनयिक नोट) सौंपने का निर्ण्य लिया । अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि चीन को इंटरनेट की आजादी पर अपने विचारों को स्पष्ट करने की जरूरत है। दुनिया के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल ने चीन पर वेबसाइट पर अभिव्यक्ति की आजादी (Freedom of Expression) को छीनने की कोशिशें करने का आरोप लगाया है और इस कारण चीन से अपना कारोबार समेटने की वॉर्निंग दी है।
वहीं दूसरी ओर चीन ने 2009 में गूगल पर कई आरोप लगाये जिसमें अश्लील साहित्य का प्रसार भी शामिल है । यह कुछ हद तक एक सही तथ्य भी है । इंटरनेट कई देशों की वर्तमान संस्कृति के लिए लगाता एक चुनौती बनता जा रहा है जिसमे गूगल सबसे महत्वपूर्ण है । चीन “संस्कृति के बचाब” का नाम लेकर समाजवाद बचाने के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तिलांजली देना चाहता है, वहीं अमेरिका (वैश्वीकरण) प्रचारित कंपनिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्र्ता के नाम पर बडे बाजार की ओर देख रही हैं ।
हम कहां है ?
भारत स्वतंत्रता के समय से ही अनु-19 के द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आजादी देता है । इसलिए वर्तमान में हमारे राजनैतिक विचारो के अनुसार भारत और वर्तमान विश्व की कंपनिया टकराव की स्थिति में नहीं है । यधपि आपातकाल तथा राष्ट्र हित में यह आजादी समाप्त कर दी जाते है परंतु इंटरनेट के युग में ऐसी स्थिति में कैसे निपटा जायेगा यह अभी भी एक मूक प्रश्न है ।
यहाँ यह उल्लेख भी आवश्यक है हमारे देश की संस्कृति को प्रदान की गई चुनौतियों का सामना अभी तक परिवार नामक संस्था बखूबी निभा रही है । राज्य या सरकार के स्थान पर माता-पिता तथा नैतिक शिक्षा द्वारा अच्छे ,बुरे की सीख से समाज अग्रसर हो रहा है । इस प्रकार भारत राजनैतिक और सामाजिक रूप से ही नहीं बल्कि भूमंडलीकरण के स्वरूप के कारण आर्थिक शक्ति बनता जा रहा है ।
Thursday, December 31, 2009
नींद का अंतिम प्रहर, बीत जाने दे जरा।
Wednesday, December 16, 2009
पुराना लेकिन ताजा विचार
ये 1991-92 की बात है ,मै कक्षा 5 में पढता था । मेरे ऊपर उस समय का कुछ ज्यादा प्रभाव पड़ा या नही ये मै नही जानता लेकिन हमारे स्कूल 2 महीने से भी ज्यादा समय तक बंद रहे ।इसलिए मै तो खुश था ।
घर के ही पास में एक मुस्लिम परिवार का फलों का गोदाम था । इस गोदाम की जमीन के मालिक चौहान अंकल थे और हम उन्ही के घर पर हम किरायेदार । भारत की आम जनता ऐसे ही रहती है या यूँ कहे कि गुजारा करती है ।
खैर बाल-मन स्कूल की छुट्टियों से कुछ हद तक खुश था उसका दूसरा कारण यह था कि केले सड़ ना जाये, इसलिए ठेले वाले अनवर भाई पूरे गोदाम की चाबियां हम बच्चों को दे गये थे और कह गये कि केले पकते जायें तो खाते जाना। जिस समय पूरा देश अयोध्या की आग में जल रहा था उस समय अनवर को अपने फलों के खराब होने की चिंता ....और उस पर भी वह कर्फ्यू के समय हिन्दू चौहानों को अपने गोदाम की चाभी देने आये । शायद उसको उसके तथाकथित धर्म का अल्पज्ञान रहा होगा ।
बिजनौर जिले का धामपुर शहर ,जैतरा गांव को रेलवे ट्रैक के द्वारा विभाजित करता है । अक्सर उन दंगो में मै पुलिस की सायरन और Announcement सुनता था ,जो यह कहता था कि दरवाजों या खिड़्कियों से ना झांके वरना देखते ही गोली मार दी जायेगी । मुझे उस समय थोड़ा डर लगता था क्योंकि कई बार मेरे “पापा और अंकल” ,दरवाजे ,खिड़्की या छ्त पर ही होते थे ।
बाद में कुछ दिनो बाद जब स्कूल खुला तब मेरे कुछ दोस्त बताते थे कि उन्होने इंसानों को कटते हुए देखा । उनके चेहरे का बनावटी भय मुझे अभी तक याद है, लेकिन उन दंगो का वास्तविक दुख झेले बच्चे किस अवस्था से गुजरें होंगे शायद मै और आप उसे महसूस करने से भयभीत हों ।
मेरे बचपन के दिन सरस्वती विधा मंदिर में और सांयकाल खाकी वर्दी पहन कर “ नमस्ते सदा वतस्ले मातृभूमे” कहते हुए संघ की शाखाओं में बीती । मुझे हिन्दू धर्म की सभी रीति रिवाज का अनुसरण करने ,प्रात: स्मरण,एकात्मता स्त्रोत्रम ,गीता श्लोक ,मंगल-व्रत करने और ध्वज प्रणाम में आंतरिक आनंद और शांति की अनुभूति होती है परंतु इन सबके बाबजूद किसी भी अन्य धर्म की पवित्र स्थान पर हथौड़ा नहीं चला सकता वो भी इस आधार पर कि भूतकाल में वहाँ मेरा मंदिर था । ऐसा इसलिए नहीं कि मै कायर हूँ बल्कि इसलिए क्योंकि अगर मै ऐसा करता हूँ तो मै स्वयं ही अपने ईश्वर की सर्वव्यापकता पर प्रश्न करता हूँ । दोनों ही धर्मों की हठधर्मिता ने कई लोगों को मानव धर्म से दूर किया ही साथ ही विश्व पटल पर उन लोगों को बोलने का मौका दे दिया जो 1947 में यह कहकर गये कि इतने सारे धर्म, जाति ,और संस्कृति कभी भी शांति से नहीं रह पायेगी और भारत के बच्चे भी पश्चिम एशिया( गाजा,फिलस्तीन,सीरिया,इजराईल) के बच्चों की तरह बारूद पर जन्म लेंगे ।
राष्ट्र ,धर्म, मानव और भूमंडल ,मुझे इन शब्दों में विरोधाभास नही लगता जब तक मै इनको किताबों में पढता हूँ ,परंतु यही शब्द वास्तव में आज के मानव समाज में घोर विरोधी हैं ।
6 दिसम्बर को मस्जिद गिरने के बाद 16 दिसम्बर 1992 को लिब्राहन कमीशन बनाया गया और लगभग 17 साल बाद अर्थात 8 दिसम्बर 2009 को सदन में इस रिपोर्ट को रखा गया ।सरकार के आंकडो में सिर्फ इस रिपोर्ट पर 80 मिलियन (8 करोड़ रूपये ) खर्च कर दिये गये । आज जब भारतीय लोग विशेषकर अल्पसंख्यक बुद्दिजीवी तमाम MNC’s में कार्य करने लगें है, कई बडे विश्वविद्यालयों मे वैज्ञानिक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं ,उनको रह रह कर 17 सालों के बाद इन कमेटियों और राज़नीतिज्ञों द्वारा यह याद दिलाने की कोशिश की जाती है कि उनके धर्मस्थल पर 17 साल पहले सम्पूर्ण हिन्दू समाज नें हमला किया था । ऐसा कहकर वो अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की बेहतरीन राजनीति करते हैं ।
दूसरी ओर भगवा लपेटी ,रथ यात्रा में सम्मलित पार्टियां है जो सदन में खड़े होकर 1992 की घटना को जन-आंदोलन का नाम देती है और उनके कई लोग इसकी तुलना असहयोग आंदोलन तक से कर डालते हैं ।
हर देश में धार्मिक ,जातीय या भाषायी अल्पसंख्यको को कभी न कभी यह लगता है कि उनकी संख्या कम होने के कारण उनके सामाजिक या सांस्कृतिक हितों को हानि पहुंचायी जा सकती है लेकिन बहुसंख्यक संप्रदाय ने जब भी अपने वचन और कर्म से यह सिद्द किया कि ये भय निराधार है तो अल्पसंख्यको का भय स्वंय समाप्त हो जाता है परंतु जब बहुसंख्यक जनता का कोई भाग सांप्रदायिक और संकीर्ण हो जाता है और अल्पसंख्यको के खिलाप बोलने या कुछ करने लगता है तो अल्पसंख्यक वर्ग अपने को असुरक्षित महसूस करने लगता है और तब अल्पसंख्यको का सांप्रदायिक और संकीर्ण नेतृत्व भी मजबूत हो जाता है । इतिहास में इसका उदाहरण बहुत साफ है आजादी से पूर्व मुस्लिम लीग वहीं मजबूत थी जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यक थे ,इसके विपरीत पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत ,पंजाब,सिंध ,और बंगाल जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक थे और अपने को सुरक्षित महसूस करते थे मुस्लिम लीग अपेक्षाकृत कमजोर थी ।(Ref-हिस्ट्री आफ माडर्न इंडिया-विपिन चंद्र)
कुल मिलाकर यदि कोई राजनीतिक दल यह समझ रहें है कि राम–राम या अली-अली चिल्ला कर वह फिर से हमें गुमराह कर लेंगे तो शायद अब थोड़ा मुश्किल है । डार्विन बहुत पहले सिद्द कर चुके है कि ऐसा कोई जरूरी नहीं कि पहलवान का बच्चा पहलवान ही हो । लेकिन यह साफ है कि आने वाली पीढी पहले से राजनीतिक समझ में बेहतर हैं । अत: पुरानी हो चुकी दुमई (सांप की प्रजाति जो काटती नहीं बल्कि चिपक जाती है) को सिर्फ सोने दें । अन्यथा फिर से नमक डालना पडेगा, मनुष्यों का दही चढाना होगा और इस प्रक्रम का फायदा विषैले सर्प लेंगे जो विष की जगह सत्ता-पिपासु हैं ।
Tuesday, October 20, 2009
माँ ....तुझमे और उसमे बहुत अंतर था ।
तुझमे और उसमे
बहुत अंतर था ॥
तुम्हारी सूखी हुई ,
दुबली हडिइया भी
कभी चुभी नहीं मुझे ,
बल्कि मर्मस्पर्शी
प्रेम में लिपटी हुई लगी ॥
तुम्हारा मुझे
वो नंगे पांव
धूप मे खड़ा कर देना
कभी रूला नहीं पाया मुझे
क्योंकि
उसके बाद
लिपटा लेती थी तुम मुझको गले से ॥
और तुम्हारा
रोज रात को पापा से
झगड़ जाना
मेरे वर्तमान और भविष्य के लिए।
मुझे सजाता रहा
और इंसान बनाता रहा ।
लेकिन वो
फूल से दिखनी वाली
जो खुद तू मेरे लिए
लेकर आई
चुभो गई अपने सारे
अस्त्र ......
और अब मै असहाय
रक्त से लथ-पथ
मरूभूमि में पड़ा
ढूंढ्ता हूँ फिर तुझे
ओ माँ ॥
Friday, September 25, 2009
एक कहानी .....सूखा समंदर
कालेज में होते तो माहौल “भारत माता” की जयकारों से गूंज गया होता ।आकाश में उड़ रहे बादलों की गर्जना को चुनौती दे दी गई होती । अनायास ही कुछ दोस्तों को गोद में उठा लिया गया होता और कुछ बेचारे GPL (बिना मतलब की मार) का शिकार बन गये होते ........लेकिन ये सभ्य लोगों की सोसाइटी थी ।चन्दर को कालेज से निकलकर JOB करने का सिर्फ 2 सालों का अनुभव था ....।
“यार यहां कुछ नही .....हम बाहर खुशिंया मनाते है।“ ...कमल ने सलाह दी ”हां यारो चलो” ” .....कहीं पटाखे मिले” ...तो मजा आ जाये ।
भारत की क्रिकॆट में जीत ....और वो भी पकिस्तान पर । भारतवासियों को इससे ज्यादा खुशी किसी में नही मिलती । और फिर मैच भी रोंमाच की हद था ।
दिल कितना कमजोर होता है ,आशा करता है कि जो सोचा है वही होगा । फिर जिंदगी की पारी शुरू होती है नया ओवर , नई अपेक्षायें, और बाजी मार लेने का जुनून ..कभी जिंदगी के इस कशमकश में गिल्लियां बिखर जाती है तो कभी स्थाइत्व और रनों से भरा हुआ ओवर मिल जाता है ..और अंत होता है हार या जीत से । सबको इंतजार होता है कि इस अंतिम ओवर का ......
शायद उन अपनो को भी ....जो कहते है कि क्रिकेट का यह मैच खत्म ना हो ...।
और फिर एक स्तव्ध सन्नाटा । सब स्टेडियम छोड़ जाते है रह जाते है तो सुलगते पटाखे ...खाली पडी सीटें और कुछ उड़्ते हुए गिद्द ,कौवे ...शायद इनको अंत में से कुछ लेने का हक विधाता ने लिखा है ।
और चंदर यही सोचता हुआ निकल पड़ा ..आज जीत हुई है और देश की इस जीत को उसने अपनी जिंदगी की जीत बना लेने का सपना देख लिया । यह दिन एक याद बन जाये बस ,एक खुशी की याद ....इसीलिए उसके हाथों ने अचानक मोबाइल में ऋचा का नम्बर ढूंढना शुरू कर दिया ।
......आगे की कहानी के लिए प्रतीक्षा
Friday, August 28, 2009
बुद्दिजीवी मनुष्य बनाम बुद्दिहीन भेढ
टेढ़ी-मेढी सड़कें
उन्ही सड़्कों पर
जमीं हुई
तपती हुई
झुलसती हुई
चंद भेंढें
उन्ही भेढों से
निकाली जाने वाली
मखमली सी ऊन
और उसी "मखमली"
ऊन से बनी सजी
सदर के नायब
की टोपी .....॥
और ऐसी ही न जाने
कितनी अनगिनत
सी टोपियाँ ॥
नायब की टोपी में
शान है
क्योंकि इनमें
अनगिनत भेड़ो का
बलिदान है ॥
दोस्तो
भूगोल की किताब का
पन्ना नम्बर 4
फिर से कुछ टूटी फूटी
टेढी-मेढी रेखायें
उन्ही रेखाओं पर
जमें हुए
खढॆ हुए
तपते हुए
झुलसते हुए
लोग
उन्ही लोगों की
नशों से बहा कुछ
रक्त,
और उसी रक्त
से सजा हुआ
चमचमाता हुआ
ये देश ।
और ऐसे ही न जाने
कितने अनगिनत
से देश ॥
इन देशों मे
जान है
शान है
क्योंकि इनमें भी
भेढों बकरियों का
बलिदान है ॥
Saturday, July 04, 2009
हमने जब भी कुछ लिखा
जाने कितने कागज पर रचनायें घुटीं।
जाने कितने शब्दों की स्वरलहरी;
बन प्रपात झरने सी झर कर चली गई।
फिर भी अंजान ,अद्र्श्य !
मानव की वाहवाही में
हम खुश हो जाते,या झूठी चंद प्रशंशा में
खुद हंस कर सारे गम को सह जाते!
जब-2 जली सुहागन चंद नोटों या सिक्कों पर
तब हमनें एक रचना रच डाली ;
जब -2 बच्चे के भूखे पर आंख पडी!
कवि को मिली खुशी ;चलो एक रचना फिर मथ डाली!
एक अभागिन जब लाज वसन थी बेच रही!
हम बता कहानी उसकी;तालियां जुटाते थे!
एक भिखारिन मन्दिर के एक कोने पर खडी रही;
हम खुश होकर कविता उस पर कह जाते थे!
क्या तुझे पता नही कवि !
तू किन्हे सुनाता अपनी ये कविताये!
ये धूर्त, कुतर के स्वामी!
जनता तेरी कवितायों पर बस खुश होती है!
तुझ पर नही !
"गरीबी ,लाचारी" पर बेखौफ तालियां पिटती है!
सौ साल पूर्व लिख दी थी एक ऐसी रचना!
जिसमें भी बच्चा भूखे पेट सोता था!!
वह "क्रांतियुग" से भी पहले का था युग जिसमें!
कवि "स्र्त्री" को "देवी" का रुपक कह्ता था!
तब बन जाते थे ऐसे ही कवि!
दरबारों के "नवरत्न" प्रिय!
अब "राष्ट्रकवि" बन जाते हैं
फूल मालाऎं मिल जाती हैं।
पर लौट के फिर जब जाता है उस मदिंर में
तो वही भिखारिन त्रश होकर आंख मिलाती है!
मासूम सा बच्चा ,लिये हथौडा !
पत्थर ! और तेजी से तोडता जाता है!!!!
बस यूंही अनायास .......
सूरज की किरणों
को पानी से धोने का
प्रयास देखता था।
हरी कोपलों पर
खुद को समेंटें हुए ओस की बूंदे
देखता था ॥
नई-2 कोपलों को
पीले हुए पत्तों के सामने
अठखेलियाँ करते हुए भी देखा ॥
समीर, जो ठंडे हुए ..
पर्वतों से आकर मेरे कानों में
कुछ फुसफुसाती थी ॥
और कुछ रंगबिरंगे फूलो पर
अदभुत सी तितलियों
को ठहरते देखा ॥
तुमको अचरज होगा ,कि मेरे
घर के आंगन में कभी मोर
कभी कोयल तो कभी सफेद
बगुले आते थे
सूखे पडे धान को चुनने ॥
और मै बालहठ में
उन्हे पकडने की नाकाम कोशिश करता ॥
अब,
न आंगन है ,न तितली हैं
न कोपल हैं ,न पीले हरे पत्ते
बस उनकी कुछ तस्वीरें,
जो बाजार में मिलती हैं
मैने अपने घर की दीवार पर
सजाने को लगा रखी हैं ॥
Sunday, January 11, 2009
भारत:-एक प्रजातांत्रिक राष्ट्र ?
जब समाज में राजनीति के प्रजातात्रिक दृष्टिकोंण का उदभव हुआ होगा तब इसकी कल्पना करने वालों ने नैतिक मूल्यों और सभी विरोधाभाषी सैद्दांतिक दृष्टिकोण के मूल्यों को समझने की कोशिश की होगी ।इस प्रकार एक ऐसे संविधान की रचना की गई जिसमें मनुष्य (प्रजा) को अधिकार प्रदान किए गये।भारत के संविधान का अवलोकन करने पर हम पाते है कि मूल अधिकारों में वाक्य और अभिव्यक्ति स्वतंत्रता (अनु-19(1)-क) को मुख्य स्थान दिया गया है साथ ही इस बात को प्रमुखता के साथ रखा गया है कि किसी भी परिस्थिति में राज्य (सरकार) का यह दायित्व है कि संविधान के इन विचारों का पालन कराया जाये और स्वयं भी किया जाये।
विगत वर्षों में भारत सरकार का हर दृश्टिक़ोण; किसी भी प्रजातांत्रिक समझ रखने वालों की समझ के परे है।प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ अर्थात प्रेस TRP और अंधी भौतिकवादी दौडों मे शामिल हो चुका है।यथार्थ को जायकेदार,मशालेदार बनाकर जनता के सामने बिना सच या झूठ को सामने रखे,सिर्फ जनता के मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर परोसा जा रहा है । पिछ्ले कुछ समय में भारत में हुई कुछ मुख्य घटनायें इस प्रकार
Ø सरकारी कर्मचारियों (IAS) के लिए छ्ठे वेतन आयोग की सिफारिशे बिना किसी शर्त के मान्य।
Ø IPS,सैनिकों द्वारा वेतन आयोग का विरोध ,विरोध का कारण रक्षा को कार्मिक क्षेत्र से कम वरीयता।
Ø 26/11 मुम्बई पर आतंकियो का हमला ।अदम्य साहस के साथ रक्षा कर्मियों ने देश की सुरक्षा की ।
Ø मुम्बई पर आतंकियो का हमला ।अदम्य साहस के साथ रक्षा कर्मियों ने देश की सुरक्षा की ।
Ø मीडिया का सरकार द्वारा उपयोग।
Ø हमले के बाद आम भारतीयों का देश के प्रति समर्पित होना ।
Ø अचानक सैनिकों की मह्त्ता सरकार द्वारा समझना, सैनिकों की वेतन संवधी मांगे पूरी ।
Ø कुछ भारतीय कम्पनियों द्वारा 2 वर्षों से प्रस्तावित हड्ताल आदि का वापस लेना ।
Ø सरकार के कुछ मंत्रियो का गैर-जिम्मेदार बयान--अंतुले प्रकरण ।
Ø नववर्ष का प्रारंभ, प्रधानमंत्री का हर प्रकार से 7% विकास दर कायम रखने का वादा ।
Ø IAS,IPS और ARMY के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की मागें।
Ø 12 वर्षो के बाद वेतन आयोग को लेकर 7-जनवरी को प्रस्तावित तेल उपक्रमों की हड्ताल का प्रारम्भ ।
Ø सरकार का 2 दिनों तक कोई विशेष ध्यान न देना।
Ø अचानक मीडिया का सरकार द्वारा भरपूर प्रयोग ।
Ø जनता के सामने सरकारी उपक्र्मों की अलग प्रकार की छवि को रखना ।
Ø दमनकारी नीति द्वारा मांगो को समाप्त कराना ।
Ø Transporters द्वारा हडताल पर जाना। 7-10 दिनो तक सरकार विफल,किसी भी प्रकार का Alternate Solution न होना ।
Ø सत्यम-Private Firm द्वारा के लाखों लोगो के पैसे के साथ खिलवाड।
ऊपर की समस्त घटनायें के विफल सरकार की कहानी प्रस्तुत करने के लिए काफी हैं।लेकिन मै विशेष रूप से Oil sector की हड़्ताल,प्रजा और राजनीतिक रूप से प्रजात्तंत्रिक रूप की सरकार पर आप लोगों का ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा ।विचारो को सामने रखने से पहले मै बता देना चाहता हूँ कि यह शासन 4 पीढी के गांधी-नेहरू परिवार का ही है ।26 वर्ष की अवस्था में मुझे नही पता कि प्रजातंत्र और परिवारवादी शासन तंत्र में कितना अंतर है।मैने विश्वशनीय किताबों मे पढा है कि भारत एक प्र्जातांत्रिक देश है इसीलिए मै ऐसा मानता भी हूँ।
इसी प्रजातांत्रिक देश ने नेहरू के सपनों के आधार पर कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम खोले । यह उपक्रम सर्वजन के लिए है और इन्ही में से कुछ को इनकी कार्य गुणवत्ता के आधार पर नवरत्न घोषित किया गया । मै आपको बताना चाहूंगा कि ये सरकारी बाबू लोगों की संस्थायें नही है ।इनमे ONGC,NTPC,GAIL,IOCL ,BPCL जैसी कम्पनियां है जिनको कार्य गुणवत्ता के आधार पर Fotune -500 में भी रखा गया है ।इनमें वो कम्पनियां है जिनके अधिकांश कर्मचारी IIM,IIT या REC की शिक्षा प्राप्त करके बीना,भटिंडा,बडौत,उंचाहार जैसी जगहों पर रहकर नये भारत को बुलंदियो तक पहुंचाने का न केवल स्पप्न देख रहे हैं बल्कि उसका वास्तविक क्रियान्वयन भी कर रहे हैं। इनमें वो कम्पनियां भी है जिनकेकर्मचारी सिर्फ सरकारी नीतियों के कारण न तो Profit कर सकती है न ही Profit sharing ,इनमें वो लोग भी है जिनमें मंजूनाथ जैसे लोग आतेहै और तथाकथित प्रजातांत्रिक सरकार के द्वारा अपना जीवन शहीद कर देते हैं ।
कुल मिलाकर वर्तमान में इन IIM,IIT,REC स्तर के कर्मचारी इनमें आते ही इनको छोड देने का विचार रखते हैं । इनके वास्तविक कारण इस प्रकार है जिनसे बहुत भिन्न कारण मीडिया या सरकारी तंत्र द्वारा आप तक पहूंचे होंगे
o प्रारंभिक स्तर पर सबसे उच्च Basic salary 12000 प्रति माह है ।
o प्रारंभिक स्तर सबसे अछ्छा Gross CTC -26000 है झूठे सरकारी /स्व्प्नलुप्त मीडिया आंकडो के हिसाब से यह 1 लाख है।
o CMD /Director स्तर पर Gross CTC -60000 है झूठे सरकारी /स्व्प्नलुप्त मीडिया आंकडो के हिसाब से यह 3 लाख है।
o पिछ्ले 12 वर्षो में किसी भी प्रकार की कोई वेतन बढोत्तरी नहीं ।
o 1997 वेतन आयोग के बाद आयोग को 10 वर्षो के स्थान पर 5 वर्ष करने की सिफारिश।
o 10 वर्ष बीत जाने पर भी सरकार द्वारा कोई Action नहीं।
o मंत्री,कैविनेट,सचिव स्तर की वेतन बढोत्तरी समय से पूर्व परंतु कर्मचारी वर्ग उपेक्षित।
o हड्ताल से पूर्व कई बार Union द्वारा चेतावनी परंतु सरकार द्वारा जानबूझकर उपेक्षित करना।
o सरकार द्वारा ह्ड्ताल की जिम्मेदारी न लेना।
o कर्मचारियों के बीच भ्रम की स्थति पैदा करना
o Transparent तरीके द्वारा भावी वेतनमान को न प्रकट करना।
o आतंरिक राजनीति में Negotiaons के स्थान पर Authoritative.
o बाह्य राजनीति में Authoritative के स्थान पर Negotiative.
o मीडेया का हर प्रकार से सामंतवादी प्रयोग
भविष्य:-
सरकारी दमन नीति से भारतीय नवरत्न कंपनियों मे रोष व्याप्त है । निश्चित रूप से इस हड्ताल को बिना शर्त समाप्त कराने के कई और प्रकार हो सकते थे परंतु राजनीतिक सुप्तता और इछ्छाशक्ति के अभाव से दमनकारी नीति को सबसे ऊपर का स्थान दिया ।जनता के बीच तेल कम्पनियों के अधिकारियों और रिफाइनिरी कर्मचारियो को मीडिया के माध्यम से देशद्रोही बताया गया।इन परिस्थितियों मे "नवरत्न" जैसे शब्द बेमानी हैं। मीडिया के एक तबके ने इनके निजीकरण (Privatization) पर जोर देना शुरू कर दिया है।यहाँ यह बताना आवश्यक है कि पैसे का यही ध्रुवीकरण "सत्यम-Scam" जैसी घटनाओं को जन्म देता है । कांग्रेस का यह Globalization phenomenon सामाजिक स्तर पर आत्मघाती ही सिद्द होगा।
एक अपील भारतीय जन मानस से:-
हड्ताल का कोई भी स्वरूप गलत है परंतु इस बात को ध्यान में रख्नना चाहिये कि
· किन कारणों से एक अत्यंत शिक्षित वर्ग उस ओर गया ?
· स्वायत्त नवरत्न कंपनियो के वेतन संवधी निर्णय सरकार द्वारा क्यों लिए जाते हैं?
· वेतन संवधी निर्णय हमेशा सरकार के अतिंम वर्ष में क्यों लिए जाते हैं?
· जिस प्रकार से सरकार ने जनता की सूचना हेतु तेल क्षेत्र के कर्मचारियों का वेतन विज्ञापनों द्वारा बताया है उसी आधार पर सर्वजन सूचना हेतु संसदीय मंत्रियो और सरकारी बाबुओं का वेतन प्रसारित करे?
· किन कारणों से सरकार आतंरिक राजनीति में Authoritative है जबकि पाकिस्तान जैसे देशो के साथ Negotiation राजनीति कर रही है ?
· क्या भारत जैसे देश में Options की कमी के कारण लोग वोट न देने पर बाध्य नहीं है ?
अतिंम विचार:-
प्रजातंत्र पर सिर्फ आतंक ही एक मात्र हमला नहीं है। एक विशेष प्रकार का तंत्र जो की पूर्णतया निरंकुश हो गया है और सत्ता जिसके हाथ में चली गई है राष्ट्र को पंगु बनाने में लगा है। भारत के सरकारी या गैर सरकारी उपक्रमों को उनके कर्मचारियों के माध्यम से मजबूत बनाना ही होगा । जब तक समाज परस्पर विरोधी वर्गों में बंटा रहेगा ,तब तक राज्य और राजनीति प्रभुत्वशाली हाथों मे रहेंगे और इनका प्रयोग पराधीन वर्ग के दमन के रूप में किया जाता रहेगा।
जो भी सरकार पूंजीवादियों के साथ मिलकर कार्य करती है वह इसी प्रकार का शोषण करती है और जनता के सम्मुख उसे नैतिक सिद्द करने का षणयंत्र रचा जाता है । भावुक और परेशान जनता भी ऐसे समय में सरकारी उपक्रमों को बिना जाने पूंजीवादी हाथों मे जाने का समर्थन करते हैं। डा गावा के विचारों मे यह एक सतत चलने वाला चक्रीय प्रक्रम है।बस देर इस बात की है कि देश का युवा वर्ग इसे कितने समय में समझ पाता है।
दमन हमेशा होने बाला प्रक्रम है । डार्विन के सिद्दांन मे भी बताया गया है कि Fittest will be the ultimate survival. पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीवादी कामगारों का शोषण करते हैं । सांमतवादी व्यवस्था में सरकारी तंत्र सभी का (वर्तमान भारतीय व्यवस्था सही रूप में इन्ही 2 का मिलन है) जबकि समाजवाद में कामगार मिलकर पूंजीपतियों का दमन करते हैं। परंतु जहाँ पूंजीवाद में निहित स्वार्थ के कारण वर्ग व्यवस्था ,राज्य और ओछी राजनीति कायम रहती है वहीं कामगारों ,कर्मचारियों की समाजवादी व्यवस्था में ऐसा कोई लालच नहीं होता है ।
भारतीय जनता को अब यह साफ करना ही होगा कि राष्ट्र का कौन सा स्वरूप सर्वोत्तम है।
अंत मे कहना चाहूंगा .....
”युवा दिल हूँ ,जवाँ दिलो को यह अभिमंत्रण देता हूँ ,
अन्यायों पर मुखर क्रांति का खुला निमंत्रण देता हूँ ।“
Friday, August 03, 2007
शैक्षिक आरक्षण :एक आवश्यकता
में जब समाज की स्थापना हुई तो कल्पनाशील मनुष्यों ने नये नियमों का सृजन किया।इन नियमों को स्थापित करने का मूल, समाज को एक व्यवस्था से बांधना मात्र था ,परंतु पुन: “असुरक्षा” की भावना,और सत्ता की लोलुपता ने मनुष्यों को ऐसे नियमों को बनाने के लिए विवश कर दिया जिनसे चिर काल तक एक वर्ग विशेष सुरक्षित रहे।जाति व्यवस्था,वर्ण व्यवस्था,गोरों द्वारा कालों से घृणा, पुरूष वर्ग द्वारा स्त्री जाति से स्वयं को अधिक पूर्ण मानना अपने चरम सीमा पर उस समय पहुंच गया जब प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं पर एक वर्ग द्वारा एकाधिकार होने लगा और दूसरे को उससे सदा के लिए वंचित करने का षडयंत्र ।आश्चर्य की बात यह है कि “निश्वार्थ आओ,सेवार्थ जाओ” की मूल भावना रखने वाला शैक्षिक जगत भी इससे अछूता नहीं रहा ।
भारतीय समाज में “एकलव्य” एवं “कर्ण” की पौराणिक कथाओं से लेकर डा.भीमराव अम्बेडकर के द्वारा शिक्षा के लिए किये गये संघर्ष के उदाहरण हमारे पास हैं।अगर इतिहास ,सामाजिक सुधार और राजनीतिक कदमों को एक साथ ज़ोडकर देंखे तो लगभग 1400 वर्षों के सामाजिक ढांचे में सुधार हेतु स्वयं डा.अम्बेडकर ने 10 वर्षों के आरक्षण का प्रारम्भिक प्रावधान किया ।यह एक व्यक्ति द्वारा संविधान के प्रति निष्ठा ही ठीक जिसने दस वर्षों के अन्दर एक बडे सामाजिक परिवर्तन का सपना देखा।
प्रथम दृश्टया वास्तव में कुछ बडे परिवर्तन भी हुए ।शिक्षा,नौकरी,ग्राम समाज के छोटे पदों से होते हुए दलित ,महिला और पिछ्डा समाज प्रशासन,संसद तथा राष्ट्र्पति भवन के गलियारों तक पहूंचा ।सामाजिक तथा आर्थिक समरसता बढी।परंतु इसके बाद भी प्रतिशत रूप का जब भी आंकलन किया गया ,उत्तर नकारात्मक ही रहे ।मंडल आयोग की सिफारिशे मानना सरकार की संवैधानिक मजबूरी थी ।
इस प्रकार, इससे पहले कि आरक्षण के विरोध में हम कोई मोर्चाबंदी करने के लिए निकलें,हमारे पास इसका कोई बेहतर और ठोस विकल्प अवश्य होना चाहिए। जिन लोगों को ‘आरक्षण’ दिया जाना हम पसंद नहीं करते, उन्हें संविधान के अनुसार प्रतिष्ठा और अवसर की समानता तथा सामाजिक न्याय प्रदान करने के लिए हमारे पास कौन-सा बेहतर वैकल्पिक उपाय है? भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो इसके लिए आरक्षण का ही उपाय किया गया है। यदि आप भारतीय संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखते हैं तो आपको आरक्षण के उस प्रावधान को लागू किए जाने का समर्थन करना चाहिए जिसे भारत की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार भारतीय संविधान के उपबंधों के दायरे में लागू करना चाह रही हो। यदि आपकी आस्था संविधान और लोकतंत्र में नहीं है तो फिर यह ध्यान रखिए कि आप आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान का विरोध भी इसीलिए कर पा रहे हैं क्योंकि भारतीय संविधान और लोकतंत्र ने ही आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार दिया है
मैने जितने भी आरक्षण के विरोधियों को सुना है ,अधिकांशत: उनमें से पदानुक्रम’ (Hierarchy) और ‘सर्वोत्तम की उत्तरजीविता’ (Survival of the fittest) को अपना सिद्धांत बनाते हैं ,परंतु वही लोग वर्षों के सामाजिक ,आर्थिक और मनोवैज्ञानिक अंतर को भूल जाते हैं।अगर हम समाज के साथ जुडकर देखें तो पायेंगे कि आरक्षण सिर्फ समाज को एकीकृत करनें का एक प्रयास है ,और मेरे विचार से आरक्षण के लिए संघर्ष तभी प्रारम्भ हो सकता है जब किसी राष्ट्र की सरकार के पास सुविधाओं के लिए कमियाँ होने लगी ।
आरक्षण का एक कारगर विकल्प हमारे पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने सुझाया कि प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों और केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में जितनी सीटें आरक्षित की जा रही हों, कुल सीटों की संख्या उसी अनुपात में बढ़ा दी जानी चाहिए ताकि गैर-आरक्षित श्रेणी के लिए पहले की तरह अवसर उपलब्ध रहें। इस सुझाव का व्यापक स्वागत हुआ। सीटों की संख्या जितनी बढ़ाई जा सके उतनी बेहतर है ताकि अधिक से अधिक लोगों को उच्च शिक्षा हासिल करने का मौका मिल सके। आदर्श स्थिति तो वह होगी जिसमें हर शिक्षार्थी को पढ़ने को मौका मिले और हर बेरोजगार को रोजगार मिले। लेकिन चूंकि प्रत्याशी अधिक होते हैं और अवसरों की उपलब्धता काफी कम होती है, इसलिए प्रतियोगिता आयोजित कराई जाती है ताकि जो सबसे योग्य हों उन्हें ही सीमित अवसरों का लाभ मिल सके। लेकिन असमान सामाजिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि के प्रत्याशियों के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता कदापि नहीं हो सकती। भारत में अभी तक ऐसी व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई है जिसमें किसी प्रतियोगिता के आयोजन से पहले हर प्रत्याशी को उसकी तैयारी के लिए समान सुविधा और समान परिस्थिति उपलब्ध हो सके। आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था में कृष्ण और सुदामा अब एक साथ नहीं पढ़ा करते । यदि आप आरक्षण के प्रावधान को समाप्त करना चाहते हैं तो पहले आप ऐसी व्यवस्था विकसित कीजिए ताकि किसी प्रतियोगिता में भाग लेने वाले हर प्रतियोगी को समान सामाजिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि उपलब्ध हो सके।
आरक्षण का विरोध वही करते हैं जिन्होंने न तो हमारा समाज देखा है और न ही अवसरों की ग़ैर-बराबरी को समझने की कोशिश की है. ध्यान रहे कि किसी भी समाज में भिन्नताओं को स्वीकार करना उस समाज की एकता को बढ़ावा देता है न कि विघटन करता है।मिसाल के तौर पर अमरीकी समाज ने जब तक अश्वेत और श्वेत के सवाल को स्वीकार नहीं किया, तबतक वहाँ विद्रोह की स्थिति थी और जब इसे सरकारी तौर पर स्वीकार कर लिया गया, तब से स्थितियाँ बहुत सुधर गई हैं।
जो लोग आरक्षण को ख़ारिज करते हैं, वो तो हमेशा से सामाजिक न्याय के सवाल को भी ख़ारिज करते रहे हैं. ये वो लोग हैं जो कि हिंदुस्तान के मध्यम वर्ग को अन्य वर्गों के लिए कुछ भी छोड़ना पड़े, इस स्थिति के लिए तैयार नहीं हैं.। इस प्रकार से स्पष्ट है कि शिक्षा में आरक्षण वर्तमान परिदृश्य में अत्यंत महत्पूर्ण हो गया है।यह न केवल सामाजिक विघटन को रोकेगा बल्कि भविष्य में नौकरियों से आरक्षण को हटाने में महत्वपूर्ण योगदान भी प्रदान करेगा ।
Tuesday, May 08, 2007
बस एक याद
गा बैठा एक छंद ॥
दूर देश में बैठे बैठे बस
याद आया एक अनुबंध ॥
चिठ्ठी पाती न होती थी
न हो पाती थी जब बात
तभी Canteen के गुप्ता जी की
एक आती थी आवाज ॥
हम दौडे दौडे जाते थे
सुनके मम्मी की आवाज।
और Mess में गिरते थे आंसू
छलक पडते थे जज्बात ॥
कांच तोड के टोपो करना
और “खुद की मेहनत” बतलाना।
क्लास में बैठी अग्र लाइन पर
नजरें खूब घुमाना ॥
“फूल तोडना मना” लिखा हो
वहां से उसे तोड के लाना
और गुलाब की उस डंडी को;
Room-mate को पकडाना ॥
दिल के सर्किट खूब समझना
पर Tronix समझ ना आये
LAN, WAN समझा हमने तब
जब Share Folder आये
कलरव की मस्ती में
युवा मंच खूब हंसता था।
उस एक रंगमहल के आगे
सब कुछ लगता “सस्ता” था ॥
एक समोसे के छह हिस्से;
और जयसिंह की वो चाय;
और पैसे न देने पे;
पंडित की लगती “हाय”।
फिर एक दिन ऐसा आता था ;
जब खूब मार पडती थी
और होंठों पे हम सबके ;
एक हंसी रहती थी ;
क्योंकि लातों की मार के आगे
दिल का प्यार आ जाता था ॥
और दर्द ज्यादा होने पे हम सबको
गले लगाना आता था॥
आठ पचास पे सोके उठना ;
और नौ पे yes sir कहना ।
फिर दस की Class में
बची नींद को पूरी करना ॥
इस पर भी गर Teacher पकडे;
तो मुंह धोकर फिर से सोना
और नींद गर ना आये
तो फिर सपनों में खोना ॥
हंसी आती है आज जब
Boss Project Line बनाता
याद आता वो वक्त जब
CT का एक दिन रह जाता ,
और chapter सात देखकर
होश उडा करते थे ।
तब मेरे जैसे कई दोस्त ;
काजल पे मिला करते थे।
और डिनर के बाद शुरु करेंगे
हम ये सोचा करते थे
खाने के तुरंत बाद नही पढना होता है;
यूंही फिर 11 बजते थे ॥
फिर आंखो की नींद भगाने हम;
”चीची” के पास जाते थे ;
और फिर वहां उसी shed में
हम फोटोस्टेट रटते थे।
बस ऐसे ही उसी जगह से;
हम एक दिन बाबू बन बैठे।
कहने को तो बहुत है लेकिन
बक्त भागता जाता है
और खडे होकर हम सब पीछे ....तकते हैं
कभी आगे जाने वालों को .....कभी पीछे छूटने बालों को
बस एक लंबी सांस के बाद;
कलम ठहर जाती है
भीनी पलकें और मुस्कान
.......साथ साथ आती हैं ॥
Sunday, March 11, 2007
कर्म
चन्दर से सभी को बहुत आशायें थी और पढाई के समय वो इन सभी आशाओं पर पूर्णतया खरा उतरा ।परन्तु अब समय निकल चुका था ।तेज तर्रार चन्दर को निकम्मा ,मक्कार की संज्ञा दी जाने लगी ।कारण वही अधिकतर युवाओं की तरह वह भी बेरोजकार ।
चन्दर रोज सुबह जल्दी उठता ,नहाता ,ईश्वर का ध्यान करता ,फिर माँ के कोमल हाथों और पिताजी की आशाओं का आशीर्वाद लेता और अपनी फाइलें लेकर निकल पडता । परंतु यह सुबह का चित्र था ।
सुबह का सूरज शाम होते-होते पीला हो जाता । घर के अन्दर घुसते ही थका हारा चन्दर लेट जाता ।बिखरे हुए बाल और लटका हुआ चेहरा बिना बोले ही “हार” की दास्तान कह देता है। पिताजी छ्डी पर हाथ का जोर और बढाकर अक्सर धीमी आवाज में सिर्फ एक ही बात करते “लाख कहा था सांइस लेने को ,तब तो पुरातत्व में दिलचस्पी थी साहब को.....सांइस के युग में इतिहास.........बेबकूफी इसे ही कहते हैं”
अरे भाई!जिन्दगी कभी दिलचस्पी से नहीं चलती ज्ञान बाबू का बेटा भी इन्ही के साथ का था ,इंजीनियर हो गया ।20000 कमाता है और एक ये साब ,20 रुपये ही ले आयें ।
चन्दर को ये बातें बुरी नही लगती ,वो जानता था माँ बाप ये बातें दिल से नहीं कहते ।यह तो संसार का नियम है कि दिल की भड़ास किसी न किसी पर निकाली जाती है और अगर उस पर गुस्सा होने से पिता जी के दिल का बोझ कम होता है तो बह सौभाग्यशाली है कि किसी तरह तो वह उनके काम आ सका । जीवन में एक विश्वास और एक दिन उसका भी होगा इस बात की आशा ,फिर पहली ही तनख्वाह से पिता जी के चश्मे का नया फ्रेम,माँ के लिए एक नई साडी और बहन के लिए एक मैड्म बाली पर्स ..............सिर्फ यही सपना था जो चन्दर के चेहरे पर अक्सर मुस्कान ले आता ।
परंतु हकीकत कुछ और कहने लगी ,छ्ह और महीने बीत गये परन्तु चन्दर को कोई नौकरी नही मिली ।वह बहुत परेशान रहता ।आज तो उसके मन को बहुत ठेस लगी ।पिता जी ने साफ तौर पर कह दिया कि अब वो उसे और नहीं ढो सकते ,नहीं नौकरी मिलती तो कोई छोटी मोटी दुकान पर काम कर लो,परंतु चन्दर अपने पैरों पर खडा होना चाह्ता था ।उसे यकीन था कि वह एक न एक दिन खुद की मेहनत के आधार पर आगे बढेगा ।
विचारों की कोई सीमा नही होती ।यह विचार ही किसी मनुष्य को जीवन की राह और उनके संकल्प दिखाते हैं । बेरोजकार व्यक्ति के विचार और कल्पनायें बहुत ऊंचे होते हैं ।ये लोग अपने आप को बडा साहसी समझकर अक्सर अपने आप को प्रधानमंत्री से ऊंचे पद पर या भ्रष्टाचार मिटा देने वाले अवतार के रूप में देखते हैं,वही प्रधानमंत्री या उससे ऊंचे पद पर बैठे लोग सदैव पद छिन जाने के डर से भयभीत रहते हैं।जिसके पास वस्तु है वह उसके छिन जाने से डरता है वहीं दूसरी ओर जिसके पास नहीं है वह जिन्दगी पर उस डर के पास जाने के लिए हाथ पैर मारता रहता है ।
परंतु चंदर इन सब से अलग था ,उसे काम में कोई अंतर नही दिखाई देता ।बह मजदूर से मालिक के अंतर को समझने में नाकामयाब था ।सडक पर चलते हुए उसकी नजर बोझ खींचने वाले एक व्यक्ति पर पडी।अचानक मजदूर ने दुकान के सामने अपना ठेला रोक दिया ---
--“यह इसी दुकान का सामान है”—दुकानदार नें पूछा
--”हां साहब” पास के गोदाम से लाया हूँ।”
--ठीक है....क़ितने पैसे हुए?
--जितने दे दो साब ..ज्यादा ही होंगे
दुकानदार ने मुस्कुराते हुए 50 रू आगे बढा दिए ,परंतु दूर खडे चन्दर के पैर भी अनायास ही दुकान की ओर चल दिये ।
50 रूपये में जिन्दगी चला लेते हो ? चन्दर ने ठेले वाले से पूछा ।
साहब,3 चक्कर रोज चला लेता हूँ ,100 से ज्यादा कमा लेता हूँ ,महीने का यही कोई 3000 । कम से कम माँ बाप पर बोझ नही हूँ ।
---पढे लिखे हो ? चन्दर ने फिर पूछा ।
हाँ साब ! माँ बाप ने बहुत मेहनत से पढाया पर नौकरी नहीं मिली....इतना कहकर ठेले बाले की आंख रूआसी हो आई ।
इससे पहले चन्दर के होंठ कुछ कह पायें ,पैर स्वंय घर की ओर तेजी से चल दिये ।मानो लगता था कि चन्दर को जबाब पहले से ही पता था बस प्रतीक्षा थी कानों से एक बार उसे सुनने की .........................!!
एक अजीब से संकल्प के साथ आज चन्दर की सुबह हुई ।वह कुछ न कुछ कमाकर ही लौटेगा ।
उसने माँ से गर्व के साथ कहा ---माँ आज मुझे नौकरी मिल गई।इस एक लाईन ने पूरे घर के माहौल को बदल दिया ।माँ की आंखे छ्ल-छ्ला उठी ।पिताजी दाढी बना रहे थे .....वो आधी –अधूरी वहीं छूट गई,बहन जिसके पैर स्कूल जाने के के लिये निकलने को थे ,अपने आप ही मुड कर बरामदे की ओर हो गये ।दौडते हुए वो भाई से लिपट गई।
पर किसी ने नही पूछा कि चन्दर को नौकरी कहाँ मिली ।यह या तो घर वालो का विश्वास था या फिर बरसों बाद आई खुशी को जी भर के जीने की तमन्ना ।
माँ ...आज तेरा बेटा कुछ कमाकर लौटेगा ।चन्दर ने पैर छूते हुए कहा ।
पिता जी ने चंदर को गले लगाकर आशीर्वाद दिया ।
चन्दर सीधे माल रोड के गोदाम में गया ।एक ठेला किराये पर लिया और फिर नकली मूंछे ,ताकि कोई न पहचान पाये कि यह पोस्ट आफिस में काम करने वाले जतिन बाबू का बेटा है ।
“जी साब । सामान कहाँ पहुँचाना है ?”
अरे बस ,यहीं पोस्ट आफिस के सामने वाली गली तक ....सामान थोडा ज्यादा है इसलिए 70 रुपये ले लेना ।
पर यह तो चन्दर की कालोनी थी ।किसी ने पहचान लिया तो ! चन्दर ने ठेले में लगे शीशे में अपने आप को देखा ।
“अरे कोई नही पहचानेगा ... फिर डरने की की क्या बात है ।सामान उतारकर तुंरत लौट आयेगा ।जिंदगी में खुद की मेहनत के पहली बार 70 रुपये आ रहे हैं ।इस ग्राहक को मना करना बिल्कुल ठीक नहीं होगा ।“
“ठीक है भाई “सामान रखो और पता बताओ ?
”सी-5/11”
चलो कम से कम यह तो अछ्छा है मेरा घर डी ब्लाक में है।चन्दर ने मन ही मन में सोचा ।
वह सामान लेकर चल पडा ।गजब का उत्साह था ,चमक थी ।सोचा था कि 70 रू मिलेंगे ।बापू का फ्रेम तो कम से कम आज ही आ जायेगा ।
चन्दर अपना ठेला लेकर कालोनी में पहूंच गया ।उसने अपने चेहरे को कपडे से ढक लिया ।आंखो मे कमाने की ललक थी तो वहीं पकडे जाने का डर भी।अजीब सी संशय की स्थिति थी ।मानो कि कोई चोरी कर रहा हो ।अचानक सामने से एक जाना पहचाना चेहरा नजर आया ....अरे यह तो मेरी बहन है।
चन्दर के हांथ कांपने लगे ।लगा बहन ने उसको पहचान लिया ।हाथ भय से कांपने लगे ।डर और शर्म के कारण चन्दर सडक पर ही रूक गया।संकरी गली में पीछे ट्रैफिक जमा होने लगा ।
“अरे ओए रिक्शा “आगे बढो।एक जोर की आवाज आई पर चन्दर नहीं हिला ।
”लडकी देख के रूक गया ....साला “...ओए चल वे आगे ।किसी नें हंसते हुए कसीदे जड दिये!
अरे भाई बहुत देख लिया अब चलो भी.....ग्राहक भी परेशान होकर बोला।
“ए मिस्टर । कहाँ ध्यान है?”
ये तो स्वंय जतिन बाबू थे ।
पिताजी ------------मन ही मन में चन्दर का ह्रदय बोल पडा ।पर शब्दों को होठों का सहारा न मिल सका ।
अबे ठेले बाले अपनी औकाद देख...घर में माँ बहन नही है तेरी ...।जो ....॥
जतिन बाबू की आंखे गुस्से से तिलमिला रही थी ।
“जी साब मै तो यूँ ही....”
“नालायक चुप ....।कह कर जतिन बाबू ने आखिरकार ठेले वाले के थप्पड रसीद दिये ।
चन्दर ने अपनी आंखो के आसूँ और ह्र्दय की सच्चाई तो छुपा लिया पर चेहरे पर लगी नकली मूंछो ने सब कुछ बयाँ कर दिया।जतिन बाबू कभी चन्दर को देखते तो कभी हाथ मे लिए ठेले को ।अचानक उनकी नजरों में सुबह का दृश्य आ गया ।
“माँ ,आज मै कुछ कमाकर लाऊंगा “
”पिता जी ,मेरी नौकरी लग गई “
जतिन बाबू वहीं सडक के किनारे बेंच पर बैठ गये ।चन्दर के हाथ में अभी भी ठेला था ,हिम्मत करके वो आगे की ओर चल दिया ।शायद किसी ने नहीं पहचान पाया कि ठेले वाला ,थप्पड मारने वाले का ही बेटा था।
--“भ्रमर कुमार”---
Friday, March 09, 2007
एक उदास सुबह
परियों के उस झुरमुट के बीच में
खडी एक प्यारी सी परी !!!!
घटा से बाल हैं जिसके;
दमक बिजली की जैसी है
कमल के फूल सी रंगत ;
हंसी मोती के जैसी है !!
मासूमियत ऐसी कि जैसे;
नन्ही गिलहरी हो;
बातें ऐसे जैसे फिजा ;
उससे ही रौनक हो ॥
बहुत देखा था बचपन में
पतंग को बादलों में छिपते-छिपाते।
और जब हाथों की डोर टूट जाती थी;
एक “उदासी”संग मेरे छ्त पे
साथ रह जाती थी।
आज फिर “परी” मेरी
वही अठखेलियां करती !
आती है और फिर उड् जाती है
सपनो से मेरे!!!
फिर आंख खुलती है
हकीकत पास आती है
हर सुबह यूहीं
इक उदासी साथ जाती है !!!!
Thursday, February 22, 2007
इंसानो की तकदीरों मे चांद नही होता है
था उसका ही चेहरा ।
फिर भी कोई समझ न पाया ,
यह पागल क्या लिख बैठा !
बेलगाम थी कलम ;
कलम हंस-2 कर बोली ।
किधर चली “भ्रमर” तेरे नयनो की डोरी,
कहां खोये हो इधर न कोई कन्या,काशी;
या फिर तुम भी बतला दो वो बात जरा सी ॥
क्यों राते अब दिन को, और दिन अब रात बुलायें ।
मन ही मन मे पगले क्यों तू मुस्काये !
पतझड की पत्ते भी,तुझको फूल दिखे हैं !
राहों के थे जो सब दुश्मन ,अब दोस्त लगे हैं
वो काले बादल तक अब कुछ-2 छटा बिखेरे !
बुझे दिये की कालिख से तू क्यों नयना जोडे !
और दर्पण से बात करे फिर चुप हो जाये ।
कांपे तेरे होंठ ,मगर दिल मुस्काये ॥
झूठ अगर कह्ती हूँ तो मै चलती चलती रूक जाऊंगी
और अगर हूँ सच्ची तो तुझसे कुछ सुनकर जाऊंगी ॥
जो कहना था कलम ,कलम खिल-2 कर बोली ;
लगा चिढाने आई हो स्याही बनके एक छोरी !!
मै बोला........
हाँ सुन !
मुझको भी चांद मिला है ।
कई दिनो से छ्त के ऊपर ,
खिला –खिला है ॥
रात बेबफा खो जाती है फिर भी दिखता है ,
सुबह-2 सागर की लहरों पर वो चलता है ॥
उसके चेहरे पर भी है एक दाग जरा सा ।
श्वेत गुलाब पर बैठे ,एक भंवरे के जैसा ॥
वो जब हंसे लगे मोतियों ने एक धार बनाई !
उसके रोने पर मेरी धडकन रूक जाये !
और जब मेरी ये नजरे उससे मिल जायें;
वही उड़ रहे काले बादल में वो छिप जाये
फिर कभी -2 खिडकी के पीछे जाके हंसती है ;
और वहीं उसी ओट से मुझको तकती है ।
पर ऐ दोस्त, कलम !
सच टूटा और रूठा सा
मेरे आंगन के एक सूखे से पौधे सा ।
चांद मिला था ,थी पूरनमासी,
उस दिन था वो पूरा !
अगले दिन ही काटा हिस्सा ।
हुआ चांद अधूरा ॥
फिर मावस की काली छाया
एक दिन आ जाती है !
दीवाने के पास सिर्फ कुछ
यादें रह जाती है....॥
दूर बैठ के बस इतना कहता ।
पत्थर की मूरत मे कोई घाव नहीं होता है
इंसानो की तकदीरों मे चांद नही होता है ।
Thursday, January 11, 2007
उम्मीद..॥
लेखक :-भ्रमर कुमार
31 दिसम्बर 2005,एक बार फिर धुंध से भरी हुई सर्द रात,कोहरे ने धरती तो कुछ इस तरह अपने आगोश में लिया कि लगा प्रकृति की सफेद रजाई ने पूरे आसमान को ढक लिया हो और उस रजाई के बाहर की यह धरती........बिना बोले सामना कर रही है कडाके की सर्दी का । हड्डियों को गला देने वाली ठंडी हवाओं को भी अपना वीभत्स रूप
आज ही दिखाना था । प्रकृति ने अपनी करवट से प्राणियों को ठहर जाने के लिए कह दिया..! लेकिन धन्य हो मनुष्य.....जिसने समय बनाया और इस समय को आदेश दिया कि कभी किसी को ठहरने मत दो।समय के उसी धुरी पर क्षण ,दिन ,महीने और साल बीते ।और आज फिर आया एक नये साल के आने का जश्न ........। तो क्या हुआ कि प्रकृति जश्न मनाने से रोक रही है। मौसम से 2-2 हाथ करने को हम शहरवासी बिल्कुल तैयार हैं...हमारे पास तेज सुर में बजता संगीत है ,रंग-बिरंगी गर्म पोशाकें है,खुशी जाहिर करने के लिए पटाखे हैं,रोशनी की जगमगाहट है ;माहौल को मदहोश करने के लिये विह्स्की के जाम और थिरकते हुए कुछ खूबसूरत इंसान । शायद अंदर से आत्मिक दुख हैं फिर भी मन तो खुश है..हमें हंसाने के लिये तरह तरह के specialist लाये गये हैं। हम दो मिलकर किसी तीसरे पर जोर-2 से हंसते हैं।
बाहर का एक इंसान अचानक से बेतुका सा प्रश्न कर बैठा
----क्या बात है भाई साहब ! बडे खुश नजर आ रहे हो ?
अचानक 30 तारीख तक चेहरे के साथ चलने वाला तनाव ,31 की रात आते ही न जाने कहाँ ,कब गायब हुआ । यह गायब हुआ है या दिखाई नही दे रहा ? या फिर हम नजर उठा कर उस तरफ देखना नहीं चाह्ते ?
----भाई साब खुश क्यो नही होंगे...नया साल जो आ रहा है।और इसी के साथ आ रही है एक आम आदमी की उम्मीद ..कि जैसे आज खुश हैं सारे साल रहें । युंही हंसते –खेलते ,नाचते गुनगुनाते वक्त बीत जाये।
और फिर अगर अगर इसी उम्मीद पर जिंदगी के कुछ पल हंसी से गुजार दिये जाये तो फिर इसकी फिक्र किसे ????
31 दिसम्बर 2006;एक बार फिर कोहरे की सर्द बूंदे कुछ ज्यादा ही सर्द हो चुकी हैं । अंधेरा इतना कि लगा ईश्वर के दिये के नीचे की कालिख यहीं किसी सतह पर जम गयी हो । निशब्द सन्नाटे के बीच कभी -2 कुत्तो के भौंखने की आवाज ,वक्त वही रात के 11 बजकर 30 मिनट का ; किसानों का एक झुरमुट कम्बल के अभाव में आग तापता हुआ ,और साथ ही कोसो दूर शहर की रोशनी की ओर टकटकी लगाकर देखते हुए..
उनमें से कुछ युवा भाग्य की लकीरों को दोषी बता रहे हैं तो कुछ वृद्ध इसी को पूर्व जन्म के पापों का फल और शहर वालों के पूर्व जन्म के पुण्य का परिणाम। आंगन में जलती हुई एक मिट्टी के तेल की कुप्पी अपने पूरे सामर्थ से हवा के साथ जंग लड रही है....परंतु गांवो में हमेशा की तरह एक बार फिर पवन का प्रहार रोशनी पर भारी पडा और दिया बुझ गया ...।
दूर शहर में एक जोर के पटाखे ने गांव की एक अनपढ बुढिया को जगा दिया ..
-------“लागत है चोर आई गए....गोली दागी राहे “
बुढिया संशय भरे भाव में बोली.
----चुप्पै सोई जाओ चाची ......नया साल शुरू हुआ ताहि तो पटाखा जलो है शहर में.।
बुढिया फिर कम्बल मे लिपटकर टूटे हुए खटोले पर सो गयी ....अचानक से फिर वही पुराना सन्नाटा ,फिर वही निशब्द वातावरण ,न नये साल की कोई मुबारकबाद ,न ही खुशी का कोई माहौल । नींद न आते हुए भी मैने कम्बल के पीछे अपना पूरा चेहरा छुपा लिया।
“ऐसा ही होता है जब उम्मीदें भी जल कर खाक हो चुकी होती हैं और लोग अगले बरस की बजाये अगले जन्म का इंतजार करते हैं “
