Thursday, December 31, 2009

नींद का अंतिम प्रहर, बीत जाने दे जरा।

नया है !

या पुराने को ही

फिर से सिल दिया ।


और

लगा दिये कुछ

और अस्तर।

पहले इस ठंड में हल्के

पानी की कुछ बूंदे छिड़्की

और फिर

घुमा दी गर्म करके

इस्तरी ॥


यूंही अक्सर

प्रेस करके छुपा देते हो ,

और गुमराह

करते हो , नया कह देते हो ,

365 दिनों के बाद उसी पुराने को ॥


ये

कुछ दैत्य रूपी क़ाटें ,

जो खाकी वर्दी में छुपकर

चीर कर रख देते हैं हमारे नये कपड़े ॥


और फिर

तुम गुमराह करते हो

कभी

काले कोट वालों से

तो कभी

सफेद टोपी वालों से ॥


ध्यान दो

अब,

हमारी मूर्खता कुछ और दिन की है ॥

शाप और वनवास अवधि खत्म होनी है ॥


और बस .......

ये नींद का अंतिम प्रहर, बीत जाने दे जरा ॥

Wednesday, December 16, 2009

पुराना लेकिन ताजा विचार

भारत में अगर किसी महाकाव्य का शीर्षक पूछा जाये तो हर एक आदमी “रामायण /महाभारत” का नाम लेगा । अगर किसी कथा के बारे में शीर्षक पूछा जाये तो “गोदान” का नाम स्वत: मन में आता है ,अगर हिन्दी चलचित्र का नाम लिया जाये तो “शोले” का नाम लिया जायेगा ।लेकिन अगर कभी मेरी पीढी के लोगो से किसी चुटक़ुले का शीर्षक पूछा जायेगा तो मेरे पास और मेरे जैसे 25-26 साल के लड़्के पास एक जबाब जरूर होगा --”ळिब्राहन कमीशन”।

ये 1991-92 की बात है ,मै कक्षा 5 में पढता था । मेरे ऊपर उस समय का कुछ ज्यादा प्रभाव पड़ा या नही ये मै नही जानता लेकिन हमारे स्कूल 2 महीने से भी ज्यादा समय तक बंद रहे ।इसलिए मै तो खुश था ।

घर के ही पास में एक मुस्लिम परिवार का फलों का गोदाम था । इस गोदाम की जमीन के मालिक चौहान अंकल थे और हम उन्ही के घर पर हम किरायेदार । भारत की आम जनता ऐसे ही रहती है या यूँ कहे कि गुजारा करती है ।


खैर बाल-मन स्कूल की छुट्टियों से कुछ हद तक खुश था उसका दूसरा कारण यह था कि केले सड़ ना जाये, इसलिए ठेले वाले अनवर भाई पूरे गोदाम की चाबियां हम बच्चों को दे गये थे और कह गये कि केले पकते जायें तो खाते जाना। जिस समय पूरा देश अयोध्या की आग में जल रहा था उस समय अनवर को अपने फलों के खराब होने की चिंता ....और उस पर भी वह कर्फ्यू के समय हिन्दू चौहानों को अपने गोदाम की चाभी देने आये । शायद उसको उसके तथाकथित धर्म का अल्पज्ञान रहा होगा ।

बिजनौर जिले का धामपुर शहर ,जैतरा गांव को रेलवे ट्रैक के द्वारा विभाजित करता है । अक्सर उन दंगो में मै पुलिस की सायरन और Announcement सुनता था ,जो यह कहता था कि दरवाजों या खिड़्कियों से ना झांके वरना देखते ही गोली मार दी जायेगी । मुझे उस समय थोड़ा डर लगता था क्योंकि कई बार मेरे “पापा और अंकल” ,दरवाजे ,खिड़्की या छ्त पर ही होते थे ।

बाद में कुछ दिनो बाद जब स्कूल खुला तब मेरे कुछ दोस्त बताते थे कि उन्होने इंसानों को कटते हुए देखा । उनके चेहरे का बनावटी भय मुझे अभी तक याद है, लेकिन उन दंगो का वास्तविक दुख झेले बच्चे किस अवस्था से गुजरें होंगे शायद मै और आप उसे महसूस करने से भयभीत हों ।

मेरे बचपन के दिन सरस्वती विधा मंदिर में और सांयकाल खाकी वर्दी पहन कर “ नमस्ते सदा वतस्ले मातृभूमे” कहते हुए संघ की शाखाओं में बीती । मुझे हिन्दू धर्म की सभी रीति रिवाज का अनुसरण करने ,प्रात: स्मरण,एकात्मता स्त्रोत्रम ,गीता श्लोक ,मंगल-व्रत करने और ध्वज प्रणाम में आंतरिक आनंद और शांति की अनुभूति होती है परंतु इन सबके बाबजूद किसी भी अन्य धर्म की पवित्र स्थान पर हथौड़ा नहीं चला सकता वो भी इस आधार पर कि भूतकाल में वहाँ मेरा मंदिर था । ऐसा इसलिए नहीं कि मै कायर हूँ बल्कि इसलिए क्योंकि अगर मै ऐसा करता हूँ तो मै स्वयं ही अपने ईश्वर की सर्वव्यापकता पर प्रश्न करता हूँ । दोनों ही धर्मों की हठधर्मिता ने कई लोगों को मानव धर्म से दूर किया ही साथ ही विश्व पटल पर उन लोगों को बोलने का मौका दे दिया जो 1947 में यह कहकर गये कि इतने सारे धर्म, जाति ,और संस्कृति कभी भी शांति से नहीं रह पायेगी और भारत के बच्चे भी पश्चिम एशिया( गाजा,फिलस्तीन,सीरिया,इजराईल) के बच्चों की तरह बारूद पर जन्म लेंगे ।

राष्ट्र ,धर्म, मानव और भूमंडल ,मुझे इन शब्दों में विरोधाभास नही लगता जब तक मै इनको किताबों में पढता हूँ ,परंतु यही शब्द वास्तव में आज के मानव समाज में घोर विरोधी हैं ।

6 दिसम्बर को मस्जिद गिरने के बाद 16 दिसम्बर 1992 को लिब्राहन कमीशन बनाया गया और लगभग 17 साल बाद अर्थात 8 दिसम्बर 2009 को सदन में इस रिपोर्ट को रखा गया ।सरकार के आंकडो में सिर्फ इस रिपोर्ट पर 80 मिलियन (8 करोड़ रूपये ) खर्च कर दिये गये । आज जब भारतीय लोग विशेषकर अल्पसंख्यक बुद्दिजीवी तमाम MNC’s में कार्य करने लगें है, कई बडे विश्वविद्यालयों मे वैज्ञानिक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं ,उनको रह रह कर 17 सालों के बाद इन कमेटियों और राज़नीतिज्ञों द्वारा यह याद दिलाने की कोशिश की जाती है कि उनके धर्मस्थल पर 17 साल पहले सम्पूर्ण हिन्दू समाज नें हमला किया था । ऐसा कहकर वो अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की बेहतरीन राजनीति करते हैं ।

दूसरी ओर भगवा लपेटी ,रथ यात्रा में सम्मलित पार्टियां है जो सदन में खड़े होकर 1992 की घटना को जन-आंदोलन का नाम देती है और उनके कई लोग इसकी तुलना असहयोग आंदोलन तक से कर डालते हैं ।

हर देश में धार्मिक ,जातीय या भाषायी अल्पसंख्यको को कभी न कभी यह लगता है कि उनकी संख्या कम होने के कारण उनके सामाजिक या सांस्कृतिक हितों को हानि पहुंचायी जा सकती है लेकिन बहुसंख्यक संप्रदाय ने जब भी अपने वचन और कर्म से यह सिद्द किया कि ये भय निराधार है तो अल्पसंख्यको का भय स्वंय समाप्त हो जाता है परंतु जब बहुसंख्यक जनता का कोई भाग सांप्रदायिक और संकीर्ण हो जाता है और अल्पसंख्यको के खिलाप बोलने या कुछ करने लगता है तो अल्पसंख्यक वर्ग अपने को असुरक्षित महसूस करने लगता है और तब अल्पसंख्यको का सांप्रदायिक और संकीर्ण नेतृत्व भी मजबूत हो जाता है । इतिहास में इसका उदाहरण बहुत साफ है आजादी से पूर्व मुस्लिम लीग वहीं मजबूत थी जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यक थे ,इसके विपरीत पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत ,पंजाब,सिंध ,और बंगाल जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक थे और अपने को सुरक्षित महसूस करते थे मुस्लिम लीग अपेक्षाकृत कमजोर थी ।(Ref-हिस्ट्री आफ माडर्न इंडिया-विपिन चंद्र)

कुल मिलाकर यदि कोई राजनीतिक दल यह समझ रहें है कि राम–राम या अली-अली चिल्ला कर वह फिर से हमें गुमराह कर लेंगे तो शायद अब थोड़ा मुश्किल है । डार्विन बहुत पहले सिद्द कर चुके है कि ऐसा कोई जरूरी नहीं कि पहलवान का बच्चा पहलवान ही हो । लेकिन यह साफ है कि आने वाली पीढी पहले से राजनीतिक समझ में बेहतर हैं । अत: पुरानी हो चुकी दुमई (सांप की प्रजाति जो काटती नहीं बल्कि चिपक जाती है) को सिर्फ सोने दें । अन्यथा फिर से नमक डालना पडेगा, मनुष्यों का दही चढाना होगा और इस प्रक्रम का फायदा विषैले सर्प लेंगे जो विष की जगह सत्ता-पिपासु हैं ।

Tuesday, October 20, 2009

माँ ....तुझमे और उसमे बहुत अंतर था ।

माँ !
तुझमे और उसमे
बहुत अंतर था ॥


तुम्हारी सूखी हुई ,
दुबली हडिइया भी
कभी चुभी नहीं मुझे ,
बल्कि मर्मस्पर्शी
प्रेम में लिपटी हुई लगी ॥



तुम्हारा मुझे
वो नंगे पांव
धूप मे खड़ा कर देना
कभी रूला नहीं पाया मुझे
क्योंकि
उसके बाद
लिपटा लेती थी तुम मुझको गले से ॥



और तुम्हारा
रोज रात को पापा से
झगड़ जाना
मेरे वर्तमान और भविष्य के लिए।
मुझे सजाता रहा
और इंसान बनाता रहा ।



लेकिन वो
फूल से दिखनी वाली
जो खुद तू मेरे लिए
लेकर आई
चुभो गई अपने सारे
अस्त्र ......



और अब मै असहाय
रक्त से लथ-पथ
मरूभूमि में पड़ा
ढूंढ्ता हूँ फिर तुझे
ओ माँ ॥

Friday, September 25, 2009

एक कहानी .....सूखा समंदर

24 सित.2007 ,कहानी की शुरूवात यहीं से होती है । खूब जोरों का शोर ,डाइनिंग रूम ...दोस्तों से भरा हुआ ,कोल्ड ड्रिंक की खाली बोतलें तथा चाय की खाली हुई कपें। चंदर को शायद आज भी याद होगा कि 20-20 के उस क्रिकेट मैच का , भारत की जीत उस दिन सिर्फ भारत की जीत नहीं थी ।चंदर का पूरा ग्रुप जीता ,इतनी खुशी की सब एक दूसरे के गले मिले । कमल ,दीपक , आलम और रंजीत सब एक दूसरे के गले मिल गये ।


कालेज में होते तो माहौल “भारत माता” की जयकारों से गूंज गया होता ।आकाश में उड़ रहे बादलों की गर्जना को चुनौती दे दी गई होती । अनायास ही कुछ दोस्तों को गोद में उठा लिया गया होता और कुछ बेचारे GPL (बिना मतलब की मार) का शिकार बन गये होते ........लेकिन ये सभ्य लोगों की सोसाइटी थी ।चन्दर को कालेज से निकलकर JOB करने का सिर्फ 2 सालों का अनुभव था ....।


“यार यहां कुछ नही .....हम बाहर खुशिंया मनाते है।“ ...कमल ने सलाह दी ”हां यारो चलो” ” .....कहीं पटाखे मिले” ...तो मजा आ जाये ।
भारत की क्रिकॆट में जीत ....और वो भी पकिस्तान पर । भारतवासियों को इससे ज्यादा खुशी किसी में नही मिलती । और फिर मैच भी रोंमाच की हद था ।


दिल कितना कमजोर होता है ,आशा करता है कि जो सोचा है वही होगा । फिर जिंदगी की पारी शुरू होती है नया ओवर , नई अपेक्षायें, और बाजी मार लेने का जुनून ..कभी जिंदगी के इस कशमकश में गिल्लियां बिखर जाती है तो कभी स्थाइत्व और रनों से भरा हुआ ओवर मिल जाता है ..और अंत होता है हार या जीत से । सबको इंतजार होता है कि इस अंतिम ओवर का ......


शायद उन अपनो को भी ....जो कहते है कि क्रिकेट का यह मैच खत्म ना हो ...।

और फिर एक स्तव्ध सन्नाटा । सब स्टेडियम छोड़ जाते है रह जाते है तो सुलगते पटाखे ...खाली पडी सीटें और कुछ उड़्ते हुए गिद्द ,कौवे ...शायद इनको अंत में से कुछ लेने का हक विधाता ने लिखा है ।


और चंदर यही सोचता हुआ निकल पड़ा ..आज जीत हुई है और देश की इस जीत को उसने अपनी जिंदगी की जीत बना लेने का सपना देख लिया । यह दिन एक याद बन जाये बस ,एक खुशी की याद ....इसीलिए उसके हाथों ने अचानक मोबाइल में ऋचा का नम्बर ढूंढना शुरू कर दिया ।

......आगे की कहानी के लिए प्रतीक्षा

Friday, August 28, 2009

बुद्दिजीवी मनुष्य बनाम बुद्दिहीन भेढ

कुछ टूटी फूटी
टेढ़ी-मेढी सड़कें
उन्ही सड़्कों पर
जमीं हुई
तपती हुई
झुलसती हुई
चंद भेंढें
उन्ही भेढों से
निकाली जाने वाली
मखमली सी ऊन
और उसी "मखमली"
ऊन से बनी सजी
सदर के नायब
की टोपी .....॥


और ऐसी ही न जाने
कितनी अनगिनत
सी टोपियाँ ॥
नायब की टोपी में
शान है
क्योंकि इनमें
अनगिनत भेड़ो का
बलिदान है ॥

दोस्तो
भूगोल की किताब का
पन्ना नम्बर 4
फिर से कुछ टूटी फूटी
टेढी-मेढी रेखायें
उन्ही रेखाओं पर
जमें हुए
खढॆ हुए
तपते हुए
झुलसते हुए
लोग
उन्ही लोगों की
नशों से बहा कुछ
रक्त,
और उसी रक्त
से सजा हुआ
चमचमाता हुआ
ये देश ।

और ऐसे ही न जाने
कितने अनगिनत
से देश ॥
इन देशों मे
जान है
शान है
क्योंकि इनमें भी
भेढों बकरियों का
बलिदान है ॥

Saturday, July 04, 2009

हमने जब भी कुछ लिखा

जाने कितने कवियों ने कवितायें लिखी;
जाने कितने कागज पर रचनायें घुटीं।
जाने कितने शब्दों की स्वरलहरी;
बन प्रपात झरने सी झर कर चली गई।

फिर भी अंजान ,अद्र्श्य !
मानव की वाहवाही में
हम खुश हो जाते,या झूठी चंद प्रशंशा में
खुद हंस कर सारे गम को सह जाते!

जब-2 जली सुहागन चंद नोटों या सिक्कों पर
तब हमनें एक रचना रच डाली ;
जब -2 बच्चे के भूखे पर आंख पडी!
कवि को मिली खुशी ;चलो एक रचना फिर मथ डाली!

एक अभागिन जब लाज वसन थी बेच रही!
हम बता कहानी उसकी;तालियां जुटाते थे!
एक भिखारिन मन्दिर के एक कोने पर खडी रही;
हम खुश होकर कविता उस पर कह जाते थे!

क्या तुझे पता नही कवि !
तू किन्हे सुनाता अपनी ये कविताये!
ये धूर्त, कुतर के स्वामी!
जनता तेरी कवितायों पर बस खुश होती है!
तुझ पर नही !
"गरीबी ,लाचारी" पर बेखौफ तालियां पिटती है!

सौ साल पूर्व लिख दी थी एक ऐसी रचना!
जिसमें भी बच्चा भूखे पेट सोता था!!
वह "क्रांतियुग" से भी पहले का था युग जिसमें!
कवि "स्र्त्री" को "देवी" का रुपक कह्ता था!

तब बन जाते थे ऐसे ही कवि!
दरबारों के "नवरत्न" प्रिय!
अब "राष्ट्रकवि" बन जाते हैं
फूल मालाऎं मिल जाती हैं।

पर लौट के फिर जब जाता है उस मदिंर में
तो वही भिखारिन त्रश होकर आंख मिलाती है!
मासूम सा बच्चा ,लिये हथौडा !
पत्थर ! और तेजी से तोडता जाता है!!!!

बस यूंही अनायास .......

पहले मैं जब सुबह उठता था

सूरज की किरणों

को पानी से धोने का

प्रयास देखता था।



हरी कोपलों पर

खुद को समेंटें हुए ओस की बूंदे

देखता था ॥



नई-2 कोपलों को

पीले हुए पत्तों के सामने

अठखेलियाँ करते हुए भी देखा ॥



समीर, जो ठंडे हुए ..

पर्वतों से आकर मेरे कानों में

कुछ फुसफुसाती थी ॥



और कुछ रंगबिरंगे फूलो पर

अदभुत सी तितलियों

को ठहरते देखा ॥



तुमको अचरज होगा ,कि मेरे

घर के आंगन में कभी मोर

कभी कोयल तो कभी सफेद

बगुले आते थे

सूखे पडे धान को चुनने ॥


और मै बालहठ में

उन्हे पकडने की नाकाम कोशिश करता ॥


अब,

न आंगन है ,न तितली हैं

न कोपल हैं ,न पीले हरे पत्ते

बस उनकी कुछ तस्वीरें,

जो बाजार में मिलती हैं

मैने अपने घर की दीवार पर

सजाने को लगा रखी हैं ॥

Sunday, January 11, 2009

भारत:-एक प्रजातांत्रिक राष्ट्र ?

अब तक के सारे समाज का इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास है।स्वतंत्रजन और दास,कुलीन और सामान्य जन,जमींदार और किसान,ठेकेदार और मिस्त्री-संक्षेप में,जालिम और मजलूम-निरंतर एक दूसरे के दुश्मन रहे हैं।वे कभी चोरी छिपे तो कभी खुले-आम लगातार आपस में लड़्ते रहें हैं,और इस ळडाई का अंत हर बार या तो सारे समाज के क्रांतिकारी पुनर्निमार्ण में हुआ ,या फिर दोनों संघर्षरत वर्गों के विनाश के रूप में सामने आया। सामजिक इतिहास का प्रत्येक अध्याय साक्षी है कि राजनीतिक सत्ता सदैव प्रभुत्वशाली वर्ग के हाथों मे रही है जिसने दूसरे वर्ग को पराधीन बनाकर उस पर निरंतर अत्याचार किए।इस तरह राज्य उत्पीड़्न का साधन मात्र रहा है ।

जब समाज में राजनीति के प्रजातात्रिक दृष्टिकोंण का उदभव हुआ होगा तब इसकी कल्पना करने वालों ने नैतिक मूल्यों और सभी विरोधाभाषी सैद्दांतिक दृष्टिकोण के मूल्यों को समझने की कोशिश की होगी ।इस प्रकार एक ऐसे संविधान की रचना की गई जिसमें मनुष्य (प्रजा) को अधिकार प्रदान किए गये।भारत के संविधान का अवलोकन करने पर हम पाते है कि मूल अधिकारों में वाक्य और अभिव्यक्ति स्वतंत्रता (अनु-19(1)-क) को मुख्य स्थान दिया गया है साथ ही इस बात को प्रमुखता के साथ रखा गया है कि किसी भी परिस्थिति में राज्य (सरकार) का यह दायित्व है कि संविधान के इन विचारों का पालन कराया जाये और स्वयं भी किया जाये।

विगत वर्षों में भारत सरकार का हर दृश्टिक़ोण; किसी भी प्रजातांत्रिक समझ रखने वालों की समझ के परे है।प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ अर्थात प्रेस TRP और अंधी भौतिकवादी दौडों मे शामिल हो चुका है।यथार्थ को जायकेदार,मशालेदार बनाकर जनता के सामने बिना सच या झूठ को सामने रखे,सिर्फ जनता के मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर परोसा जा रहा है । पिछ्ले कुछ समय में भारत में हुई कुछ मुख्य घटनायें इस प्रकार

Ø सरकारी कर्मचारियों (IAS) के लिए छ्ठे वेतन आयोग की सिफारिशे बिना किसी शर्त के मान्य।
Ø IPS,सैनिकों द्वारा वेतन आयोग का विरोध ,विरोध का कारण रक्षा को कार्मिक क्षेत्र से कम वरीयता।
Ø 26/11 मुम्बई पर आतंकियो का हमला ।अदम्य साहस के साथ रक्षा कर्मियों ने देश की सुरक्षा की ।
Ø मुम्बई पर आतंकियो का हमला ।अदम्य साहस के साथ रक्षा कर्मियों ने देश की सुरक्षा की ।
Ø मीडिया का सरकार द्वारा उपयोग।
Ø हमले के बाद आम भारतीयों का देश के प्रति समर्पित होना ।
Ø अचानक सैनिकों की मह्त्ता सरकार द्वारा समझना, सैनिकों की वेतन संवधी मांगे पूरी ।
Ø कुछ भारतीय कम्पनियों द्वारा 2 वर्षों से प्रस्तावित हड्ताल आदि का वापस लेना ।
Ø सरकार के कुछ मंत्रियो का गैर-जिम्मेदार बयान--अंतुले प्रकरण ।
Ø नववर्ष का प्रारंभ, प्रधानमंत्री का हर प्रकार से 7% विकास दर कायम रखने का वादा ।
Ø IAS,IPS और ARMY के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की मागें।
Ø 12 वर्षो के बाद वेतन आयोग को लेकर 7-जनवरी को प्रस्तावित तेल उपक्रमों की हड्ताल का प्रारम्भ ।
Ø सरकार का 2 दिनों तक कोई विशेष ध्यान न देना।
Ø अचानक मीडिया का सरकार द्वारा भरपूर प्रयोग ।
Ø जनता के सामने सरकारी उपक्र्मों की अलग प्रकार की छवि को रखना ।
Ø दमनकारी नीति द्वारा मांगो को समाप्त कराना ।
Ø Transporters द्वारा हडताल पर जाना। 7-10 दिनो तक सरकार विफल,किसी भी प्रकार का Alternate Solution न होना ।
Ø सत्यम-Private Firm द्वारा के लाखों लोगो के पैसे के साथ खिलवाड।

ऊपर की समस्त घटनायें के विफल सरकार की कहानी प्रस्तुत करने के लिए काफी हैं।लेकिन मै विशेष रूप से Oil sector की हड़्ताल,प्रजा और राजनीतिक रूप से प्रजात्तंत्रिक रूप की सरकार पर आप लोगों का ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा ।विचारो को सामने रखने से पहले मै बता देना चाहता हूँ कि यह शासन 4 पीढी के गांधी-नेहरू परिवार का ही है ।26 वर्ष की अवस्था में मुझे नही पता कि प्रजातंत्र और परिवारवादी शासन तंत्र में कितना अंतर है।मैने विश्वशनीय किताबों मे पढा है कि भारत एक प्र्जातांत्रिक देश है इसीलिए मै ऐसा मानता भी हूँ।

इसी प्रजातांत्रिक देश ने नेहरू के सपनों के आधार पर कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम खोले । यह उपक्रम सर्वजन के लिए है और इन्ही में से कुछ को इनकी कार्य गुणवत्ता के आधार पर नवरत्न घोषित किया गया । मै आपको बताना चाहूंगा कि ये सरकारी बाबू लोगों की संस्थायें नही है ।इनमे ONGC,NTPC,GAIL,IOCL ,BPCL जैसी कम्पनियां है जिनको कार्य गुणवत्ता के आधार पर Fotune -500 में भी रखा गया है ।इनमें वो कम्पनियां है जिनके अधिकांश कर्मचारी IIM,IIT या REC की शिक्षा प्राप्त करके बीना,भटिंडा,बडौत,उंचाहार जैसी जगहों पर रहकर नये भारत को बुलंदियो तक पहुंचाने का न केवल स्पप्न देख रहे हैं बल्कि उसका वास्तविक क्रियान्वयन भी कर रहे हैं। इनमें वो कम्पनियां भी है जिनकेकर्मचारी सिर्फ सरकारी नीतियों के कारण न तो Profit कर सकती है न ही Profit sharing ,इनमें वो लोग भी है जिनमें मंजूनाथ जैसे लोग आतेहै और तथाकथित प्रजातांत्रिक सरकार के द्वारा अपना जीवन शहीद कर देते हैं ।

कुल मिलाकर वर्तमान में इन IIM,IIT,REC स्तर के कर्मचारी इनमें आते ही इनको छोड देने का विचार रखते हैं । इनके वास्तविक कारण इस प्रकार है जिनसे बहुत भिन्न कारण मीडिया या सरकारी तंत्र द्वारा आप तक पहूंचे होंगे
o प्रारंभिक स्तर पर सबसे उच्च Basic salary 12000 प्रति माह है ।
o प्रारंभिक स्तर सबसे अछ्छा Gross CTC -26000 है झूठे सरकारी /स्व्प्नलुप्त मीडिया आंकडो के हिसाब से यह 1 लाख है।
o CMD /Director स्तर पर Gross CTC -60000 है झूठे सरकारी /स्व्प्नलुप्त मीडिया आंकडो के हिसाब से यह 3 लाख है।
o पिछ्ले 12 वर्षो में किसी भी प्रकार की कोई वेतन बढोत्तरी नहीं ।
o 1997 वेतन आयोग के बाद आयोग को 10 वर्षो के स्थान पर 5 वर्ष करने की सिफारिश।
o 10 वर्ष बीत जाने पर भी सरकार द्वारा कोई Action नहीं।
o मंत्री,कैविनेट,सचिव स्तर की वेतन बढोत्तरी समय से पूर्व परंतु कर्मचारी वर्ग उपेक्षित।
o हड्ताल से पूर्व कई बार Union द्वारा चेतावनी परंतु सरकार द्वारा जानबूझकर उपेक्षित करना।
o सरकार द्वारा ह्ड्ताल की जिम्मेदारी न लेना।
o कर्मचारियों के बीच भ्रम की स्थति पैदा करना
o Transparent तरीके द्वारा भावी वेतनमान को न प्रकट करना।
o आतंरिक राजनीति में Negotiaons के स्थान पर Authoritative.
o बाह्य राजनीति में Authoritative के स्थान पर Negotiative.
o मीडेया का हर प्रकार से सामंतवादी प्रयोग

भविष्य:-

सरकारी दमन नीति से भारतीय नवरत्न कंपनियों मे रोष व्याप्त है । निश्चित रूप से इस हड्ताल को बिना शर्त समाप्त कराने के कई और प्रकार हो सकते थे परंतु राजनीतिक सुप्तता और इछ्छाशक्ति के अभाव से दमनकारी नीति को सबसे ऊपर का स्थान दिया ।जनता के बीच तेल कम्पनियों के अधिकारियों और रिफाइनिरी कर्मचारियो को मीडिया के माध्यम से देशद्रोही बताया गया।इन परिस्थितियों मे "नवरत्न" जैसे शब्द बेमानी हैं। मीडिया के एक तबके ने इनके निजीकरण (Privatization) पर जोर देना शुरू कर दिया है।यहाँ यह बताना आवश्यक है कि पैसे का यही ध्रुवीकरण "सत्यम-Scam" जैसी घटनाओं को जन्म देता है । कांग्रेस का यह Globalization phenomenon सामाजिक स्तर पर आत्मघाती ही सिद्द होगा।

एक अपील भारतीय जन मानस से:-

हड्ताल का कोई भी स्वरूप गलत है परंतु इस बात को ध्यान में रख्नना चाहिये कि
· किन कारणों से एक अत्यंत शिक्षित वर्ग उस ओर गया ?
· स्वायत्त नवरत्न कंपनियो के वेतन संवधी निर्णय सरकार द्वारा क्यों लिए जाते हैं?
· वेतन संवधी निर्णय हमेशा सरकार के अतिंम वर्ष में क्यों लिए जाते हैं?
· जिस प्रकार से सरकार ने जनता की सूचना हेतु तेल क्षेत्र के कर्मचारियों का वेतन विज्ञापनों द्वारा बताया है उसी आधार पर सर्वजन सूचना हेतु संसदीय मंत्रियो और सरकारी बाबुओं का वेतन प्रसारित करे?
· किन कारणों से सरकार आतंरिक राजनीति में Authoritative है जबकि पाकिस्तान जैसे देशो के साथ Negotiation राजनीति कर रही है ?
· क्या भारत जैसे देश में Options की कमी के कारण लोग वोट न देने पर बाध्य नहीं है ?

अतिंम विचार:-

प्रजातंत्र पर सिर्फ आतंक ही एक मात्र हमला नहीं है। एक विशेष प्रकार का तंत्र जो की पूर्णतया निरंकुश हो गया है और सत्ता जिसके हाथ में चली गई है राष्ट्र को पंगु बनाने में लगा है। भारत के सरकारी या गैर सरकारी उपक्रमों को उनके कर्मचारियों के माध्यम से मजबूत बनाना ही होगा । जब तक समाज परस्पर विरोधी वर्गों में बंटा रहेगा ,तब तक राज्य और राजनीति प्रभुत्वशाली हाथों मे रहेंगे और इनका प्रयोग पराधीन वर्ग के दमन के रूप में किया जाता रहेगा।

जो भी सरकार पूंजीवादियों के साथ मिलकर कार्य करती है वह इसी प्रकार का शोषण करती है और जनता के सम्मुख उसे नैतिक सिद्द करने का षणयंत्र रचा जाता है । भावुक और परेशान जनता भी ऐसे समय में सरकारी उपक्रमों को बिना जाने पूंजीवादी हाथों मे जाने का समर्थन करते हैं। डा गावा के विचारों मे यह एक सतत चलने वाला चक्रीय प्रक्रम है।बस देर इस बात की है कि देश का युवा वर्ग इसे कितने समय में समझ पाता है।

दमन हमेशा होने बाला प्रक्रम है । डार्विन के सिद्दांन मे भी बताया गया है कि Fittest will be the ultimate survival. पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीवादी कामगारों का शोषण करते हैं । सांमतवादी व्यवस्था में सरकारी तंत्र सभी का (वर्तमान भारतीय व्यवस्था सही रूप में इन्ही 2 का मिलन है) जबकि समाजवाद में कामगार मिलकर पूंजीपतियों का दमन करते हैं। परंतु जहाँ पूंजीवाद में निहित स्वार्थ के कारण वर्ग व्यवस्था ,राज्य और ओछी राजनीति कायम रहती है वहीं कामगारों ,कर्मचारियों की समाजवादी व्यवस्था में ऐसा कोई लालच नहीं होता है ।

भारतीय जनता को अब यह साफ करना ही होगा कि राष्ट्र का कौन सा स्वरूप सर्वोत्तम है।

अंत मे कहना चाहूंगा .....

”युवा दिल हूँ ,जवाँ दिलो को यह अभिमंत्रण देता हूँ ,
अन्यायों पर मुखर क्रांति का खुला निमंत्रण देता हूँ ।“


Friday, August 03, 2007

शैक्षिक आरक्षण :एक आवश्यकता

आदि के उत्थान से लेकर अनंत के गर्भ तक जिस मानवीय सभ्यता पर हमें सर्वाधिक गर्वानुभूति होती है उसी सभ्यता के निचले धरातल पर मानव द्वारा किए गये कुछ ऐसे स्वार्थ हैं जिनको समय समय पर बुद्दिजीवियों द्वारा “गलत प्रावधान” के रूप में स्वीकार किया गया ।जीवित रहने के लिए असुरक्षा की मनोवैजानिक भावना ने “जीवन और सत्ता के लिए संघर्ष:-एक आवश्यकता” के डार्विन सिद्धांत को और सुदृण किया ।

में जब समाज की स्थापना हुई तो कल्पनाशील मनुष्यों ने नये नियमों का सृजन किया।इन नियमों को स्थापित करने का मूल, समाज को एक व्यवस्था से बांधना मात्र था ,परंतु पुन: “असुरक्षा” की भावना,और सत्ता की लोलुपता ने मनुष्यों को ऐसे नियमों को बनाने के लिए विवश कर दिया जिनसे चिर काल तक एक वर्ग विशेष सुरक्षित रहे।जाति व्यवस्था,वर्ण व्यवस्था,गोरों द्वारा कालों से घृणा, पुरूष वर्ग द्वारा स्त्री जाति से स्वयं को अधिक पूर्ण मानना अपने चरम सीमा पर उस समय पहुंच गया जब प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं पर एक वर्ग द्वारा एकाधिकार होने लगा और दूसरे को उससे सदा के लिए वंचित करने का षडयंत्र ।आश्चर्य की बात यह है कि “निश्वार्थ आओ,सेवार्थ जाओ” की मूल भावना रखने वाला शैक्षिक जगत भी इससे अछूता नहीं रहा ।

भारतीय समाज में “एकलव्य” एवं “कर्ण” की पौराणिक कथाओं से लेकर डा.भीमराव अम्बेडकर के द्वारा शिक्षा के लिए किये गये संघर्ष के उदाहरण हमारे पास हैं।अगर इतिहास ,सामाजिक सुधार और राजनीतिक कदमों को एक साथ ज़ोडकर देंखे तो लगभग 1400 वर्षों के सामाजिक ढांचे में सुधार हेतु स्वयं डा.अम्बेडकर ने 10 वर्षों के आरक्षण का प्रारम्भिक प्रावधान किया ।यह एक व्यक्ति द्वारा संविधान के प्रति निष्ठा ही ठीक जिसने दस वर्षों के अन्दर एक बडे सामाजिक परिवर्तन का सपना देखा।
प्रथम दृश्टया वास्तव में कुछ बडे परिवर्तन भी हुए ।शिक्षा,नौकरी,ग्राम समाज के छोटे पदों से होते हुए दलित ,महिला और पिछ्डा समाज प्रशासन,संसद तथा राष्ट्र्पति भवन के गलियारों तक पहूंचा ।सामाजिक तथा आर्थिक समरसता बढी।परंतु इसके बाद भी प्रतिशत रूप का जब भी आंकलन किया गया ,उत्तर नकारात्मक ही रहे ।मंडल आयोग की सिफारिशे मानना सरकार की संवैधानिक मजबूरी थी ।

इस प्रकार, इससे पहले कि आरक्षण के विरोध में हम कोई मोर्चाबंदी करने के लिए निकलें,हमारे पास इसका कोई बेहतर और ठोस विकल्प अवश्य होना चाहिए। जिन लोगों को ‘आरक्षण’ दिया जाना हम पसंद नहीं करते, उन्हें संविधान के अनुसार प्रतिष्ठा और अवसर की समानता तथा सामाजिक न्याय प्रदान करने के लिए हमारे पास कौन-सा बेहतर वैकल्पिक उपाय है? भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो इसके लिए आरक्षण का ही उपाय किया गया है। यदि आप भारतीय संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखते हैं तो आपको आरक्षण के उस प्रावधान को लागू किए जाने का समर्थन करना चाहिए जिसे भारत की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार भारतीय संविधान के उपबंधों के दायरे में लागू करना चाह रही हो। यदि आपकी आस्था संविधान और लोकतंत्र में नहीं है तो फिर यह ध्यान रखिए कि आप आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान का विरोध भी इसीलिए कर पा रहे हैं क्योंकि भारतीय संविधान और लोकतंत्र ने ही आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार दिया है

मैने जितने भी आरक्षण के विरोधियों को सुना है ,अधिकांशत: उनमें से पदानुक्रम’ (Hierarchy) और ‘सर्वोत्तम की उत्तरजीविता’ (Survival of the fittest) को अपना सिद्धांत बनाते हैं ,परंतु वही लोग वर्षों के सामाजिक ,आर्थिक और मनोवैज्ञानिक अंतर को भूल जाते हैं।अगर हम समाज के साथ जुडकर देखें तो पायेंगे कि आरक्षण सिर्फ समाज को एकीकृत करनें का एक प्रयास है ,और मेरे विचार से आरक्षण के लिए संघर्ष तभी प्रारम्भ हो सकता है जब किसी राष्ट्र की सरकार के पास सुविधाओं के लिए कमियाँ होने लगी ।

आरक्षण का एक कारगर विकल्प हमारे पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने सुझाया कि प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों और केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में जितनी सीटें आरक्षित की जा रही हों, कुल सीटों की संख्या उसी अनुपात में बढ़ा दी जानी चाहिए ताकि गैर-आरक्षित श्रेणी के लिए पहले की तरह अवसर उपलब्ध रहें। इस सुझाव का व्यापक स्वागत हुआ। सीटों की संख्या जितनी बढ़ाई जा सके उतनी बेहतर है ताकि अधिक से अधिक लोगों को उच्च शिक्षा हासिल करने का मौका मिल सके। आदर्श स्थिति तो वह होगी जिसमें हर शिक्षार्थी को पढ़ने को मौका मिले और हर बेरोजगार को रोजगार मिले। लेकिन चूंकि प्रत्याशी अधिक होते हैं और अवसरों की उपलब्धता काफी कम होती है, इसलिए प्रतियोगिता आयोजित कराई जाती है ताकि जो सबसे योग्य हों उन्हें ही सीमित अवसरों का लाभ मिल सके। लेकिन असमान सामाजिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि के प्रत्याशियों के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता कदापि नहीं हो सकती। भारत में अभी तक ऐसी व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई है जिसमें किसी प्रतियोगिता के आयोजन से पहले हर प्रत्याशी को उसकी तैयारी के लिए समान सुविधा और समान परिस्थिति उपलब्ध हो सके। आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था में कृष्ण और सुदामा अब एक साथ नहीं पढ़ा करते । यदि आप आरक्षण के प्रावधान को समाप्त करना चाहते हैं तो पहले आप ऐसी व्यवस्था विकसित कीजिए ताकि किसी प्रतियोगिता में भाग लेने वाले हर प्रतियोगी को समान सामाजिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि उपलब्ध हो सके।
आरक्षण का विरोध वही करते हैं जिन्होंने न तो हमारा समाज देखा है और न ही अवसरों की ग़ैर-बराबरी को समझने की कोशिश की है. ध्यान रहे कि किसी भी समाज में भिन्नताओं को स्वीकार करना उस समाज की एकता को बढ़ावा देता है न कि विघटन करता है।मिसाल के तौर पर अमरीकी समाज ने जब तक अश्वेत और श्वेत के सवाल को स्वीकार नहीं किया, तबतक वहाँ विद्रोह की स्थिति थी और जब इसे सरकारी तौर पर स्वीकार कर लिया गया, तब से स्थितियाँ बहुत सुधर गई हैं।

जो लोग आरक्षण को ख़ारिज करते हैं, वो तो हमेशा से सामाजिक न्याय के सवाल को भी ख़ारिज करते रहे हैं. ये वो लोग हैं जो कि हिंदुस्तान के मध्यम वर्ग को अन्य वर्गों के लिए कुछ भी छोड़ना पड़े, इस स्थिति के लिए तैयार नहीं हैं.। इस प्रकार से स्पष्ट है कि शिक्षा में आरक्षण वर्तमान परिदृश्य में अत्यंत महत्पूर्ण हो गया है।यह न केवल सामाजिक विघटन को रोकेगा बल्कि भविष्य में नौकरियों से आरक्षण को हटाने में महत्वपूर्ण योगदान भी प्रदान करेगा ।

Tuesday, May 08, 2007

बस एक याद

कहूँ शब्दों से क्या मै बस;
गा बैठा एक छंद ॥
दूर देश में बैठे बैठे बस
याद आया एक अनुबंध ॥

चिठ्ठी पाती न होती थी
न हो पाती थी जब बात
तभी Canteen के गुप्ता जी की
एक आती थी आवाज ॥

हम दौडे दौडे जाते थे
सुनके मम्मी की आवाज।
और Mess में गिरते थे आंसू
छलक पडते थे जज्बात ॥

कांच तोड के टोपो करना
और “खुद की मेहनत” बतलाना।
क्लास में बैठी अग्र लाइन पर
नजरें खूब घुमाना ॥

“फूल तोडना मना” लिखा हो
वहां से उसे तोड के लाना
और गुलाब की उस डंडी को;
Room-mate को पकडाना ॥

दिल के सर्किट खूब समझना
पर Tronix समझ ना आये
LAN, WAN समझा हमने तब
जब Share Folder आये

कलरव की मस्ती में
युवा मंच खूब हंसता था।
उस एक रंगमहल के आगे
सब कुछ लगता “सस्ता” था ॥

एक समोसे के छह हिस्से;
और जयसिंह की वो चाय;
और पैसे न देने पे;
पंडित की लगती “हाय”।

फिर एक दिन ऐसा आता था ;
जब खूब मार पडती थी
और होंठों पे हम सबके ;
एक हंसी रहती थी ;

क्योंकि लातों की मार के आगे
दिल का प्यार आ जाता था ॥
और दर्द ज्यादा होने पे हम सबको
गले लगाना आता था॥

आठ पचास पे सोके उठना ;
और नौ पे yes sir कहना ।
फिर दस की Class में
बची नींद को पूरी करना ॥

इस पर भी गर Teacher पकडे;
तो मुंह धोकर फिर से सोना
और नींद गर ना आये
तो फिर सपनों में खोना ॥

हंसी आती है आज जब
Boss Project Line बनाता
याद आता वो वक्त जब
CT का एक दिन रह जाता ,
और chapter सात देखकर
होश उडा करते थे ।
तब मेरे जैसे कई दोस्त ;
काजल पे मिला करते थे।

और डिनर के बाद शुरु करेंगे
हम ये सोचा करते थे
खाने के तुरंत बाद नही पढना होता है;
यूंही फिर 11 बजते थे ॥

फिर आंखो की नींद भगाने हम;
”चीची” के पास जाते थे ;
और फिर वहां उसी shed में
हम फोटोस्टेट रटते थे।

बस ऐसे ही उसी जगह से;
हम एक दिन बाबू बन बैठे।

कहने को तो बहुत है लेकिन
बक्त भागता जाता है
और खडे होकर हम सब पीछे ....तकते हैं
कभी आगे जाने वालों को .....कभी पीछे छूटने बालों को
बस एक लंबी सांस के बाद;
कलम ठहर जाती है
भीनी पलकें और मुस्कान
.......साथ साथ आती हैं ॥

Sunday, March 11, 2007

कर्म

कर्म की प्रतीक्षा में शायद जीवन नष्ट हो जाता है परन्तु इंसान को क्षमता के अनुसार कर्म नहीं मिलता । शायद वह इसे कभी नहीं ढूंढ नहीं पाता या फिर कर्म स्वंय उससे दूर भागता ।चन्दर बी.ए. पास था वो भी प्रथम श्रेणी में । क्लास में अव्वल रहता ,पिता जी साधारण से पोस्ट आफिस में क्लर्क़ थे । घर पर एक बडी बहन थी जो राजनीति से एम.ए करके पास के स्कूल में छोटे बच्चों को पढानें लगी थी ।
चन्दर से सभी को बहुत आशायें थी और पढाई के समय वो इन सभी आशाओं पर पूर्णतया खरा उतरा ।परन्तु अब समय निकल चुका था ।तेज तर्रार चन्दर को निकम्मा ,मक्कार की संज्ञा दी जाने लगी ।कारण वही अधिकतर युवाओं की तरह वह भी बेरोजकार ।

चन्दर रोज सुबह जल्दी उठता ,नहाता ,ईश्वर का ध्यान करता ,फिर माँ के कोमल हाथों और पिताजी की आशाओं का आशीर्वाद लेता और अपनी फाइलें लेकर निकल पडता । परंतु यह सुबह का चित्र था ।
सुबह का सूरज शाम होते-होते पीला हो जाता । घर के अन्दर घुसते ही थका हारा चन्दर लेट जाता ।बिखरे हुए बाल और लटका हुआ चेहरा बिना बोले ही “हार” की दास्तान कह देता है। पिताजी छ्डी पर हाथ का जोर और बढाकर अक्सर धीमी आवाज में सिर्फ एक ही बात करते “लाख कहा था सांइस लेने को ,तब तो पुरातत्व में दिलचस्पी थी साहब को.....सांइस के युग में इतिहास.........बेबकूफी इसे ही कहते हैं”

अरे भाई!जिन्दगी कभी दिलचस्पी से नहीं चलती ज्ञान बाबू का बेटा भी इन्ही के साथ का था ,इंजीनियर हो गया ।20000 कमाता है और एक ये साब ,20 रुपये ही ले आयें ।

चन्दर को ये बातें बुरी नही लगती ,वो जानता था माँ बाप ये बातें दिल से नहीं कहते ।यह तो संसार का नियम है कि दिल की भड़ास किसी न किसी पर निकाली जाती है और अगर उस पर गुस्सा होने से पिता जी के दिल का बोझ कम होता है तो बह सौभाग्यशाली है कि किसी तरह तो वह उनके काम आ सका । जीवन में एक विश्वास और एक दिन उसका भी होगा इस बात की आशा ,फिर पहली ही तनख्वाह से पिता जी के चश्मे का नया फ्रेम,माँ के लिए एक नई साडी और बहन के लिए एक मैड्म बाली पर्स ..............सिर्फ यही सपना था जो चन्दर के चेहरे पर अक्सर मुस्कान ले आता ।

परंतु हकीकत कुछ और कहने लगी ,छ्ह और महीने बीत गये परन्तु चन्दर को कोई नौकरी नही मिली ।वह बहुत परेशान रहता ।आज तो उसके मन को बहुत ठेस लगी ।पिता जी ने साफ तौर पर कह दिया कि अब वो उसे और नहीं ढो सकते ,नहीं नौकरी मिलती तो कोई छोटी मोटी दुकान पर काम कर लो,परंतु चन्दर अपने पैरों पर खडा होना चाह्ता था ।उसे यकीन था कि वह एक न एक दिन खुद की मेहनत के आधार पर आगे बढेगा ।

विचारों की कोई सीमा नही होती ।यह विचार ही किसी मनुष्य को जीवन की राह और उनके संकल्प दिखाते हैं । बेरोजकार व्यक्ति के विचार और कल्पनायें बहुत ऊंचे होते हैं ।ये लोग अपने आप को बडा साहसी समझकर अक्सर अपने आप को प्रधानमंत्री से ऊंचे पद पर या भ्रष्टाचार मिटा देने वाले अवतार के रूप में देखते हैं,वही प्रधानमंत्री या उससे ऊंचे पद पर बैठे लोग सदैव पद छिन जाने के डर से भयभीत रहते हैं।जिसके पास वस्तु है वह उसके छिन जाने से डरता है वहीं दूसरी ओर जिसके पास नहीं है वह जिन्दगी पर उस डर के पास जाने के लिए हाथ पैर मारता रहता है ।

परंतु चंदर इन सब से अलग था ,उसे काम में कोई अंतर नही दिखाई देता ।बह मजदूर से मालिक के अंतर को समझने में नाकामयाब था ।सडक पर चलते हुए उसकी नजर बोझ खींचने वाले एक व्यक्ति पर पडी।अचानक मजदूर ने दुकान के सामने अपना ठेला रोक दिया ---

--“यह इसी दुकान का सामान है”—दुकानदार नें पूछा
--”हां साहब” पास के गोदाम से लाया हूँ।”
--ठीक है....क़ितने पैसे हुए?
--जितने दे दो साब ..ज्यादा ही होंगे

दुकानदार ने मुस्कुराते हुए 50 रू आगे बढा दिए ,परंतु दूर खडे चन्दर के पैर भी अनायास ही दुकान की ओर चल दिये ।

50 रूपये में जिन्दगी चला लेते हो ? चन्दर ने ठेले वाले से पूछा ।
साहब,3 चक्कर रोज चला लेता हूँ ,100 से ज्यादा कमा लेता हूँ ,महीने का यही कोई 3000 । कम से कम माँ बाप पर बोझ नही हूँ ।

---पढे लिखे हो ? चन्दर ने फिर पूछा ।
हाँ साब ! माँ बाप ने बहुत मेहनत से पढाया पर नौकरी नहीं मिली....इतना कहकर ठेले बाले की आंख रूआसी हो आई ।

इससे पहले चन्दर के होंठ कुछ कह पायें ,पैर स्वंय घर की ओर तेजी से चल दिये ।मानो लगता था कि चन्दर को जबाब पहले से ही पता था बस प्रतीक्षा थी कानों से एक बार उसे सुनने की .........................!!

एक अजीब से संकल्प के साथ आज चन्दर की सुबह हुई ।वह कुछ न कुछ कमाकर ही लौटेगा ।

उसने माँ से गर्व के साथ कहा ---माँ आज मुझे नौकरी मिल गई।इस एक लाईन ने पूरे घर के माहौल को बदल दिया ।माँ की आंखे छ्ल-छ्ला उठी ।पिताजी दाढी बना रहे थे .....वो आधी –अधूरी वहीं छूट गई,बहन जिसके पैर स्कूल जाने के के लिये निकलने को थे ,अपने आप ही मुड कर बरामदे की ओर हो गये ।दौडते हुए वो भाई से लिपट गई।

पर किसी ने नही पूछा कि चन्दर को नौकरी कहाँ मिली ।यह या तो घर वालो का विश्वास था या फिर बरसों बाद आई खुशी को जी भर के जीने की तमन्ना ।

माँ ...आज तेरा बेटा कुछ कमाकर लौटेगा ।चन्दर ने पैर छूते हुए कहा ।
पिता जी ने चंदर को गले लगाकर आशीर्वाद दिया ।
चन्दर सीधे माल रोड के गोदाम में गया ।एक ठेला किराये पर लिया और फिर नकली मूंछे ,ताकि कोई न पहचान पाये कि यह पोस्ट आफिस में काम करने वाले जतिन बाबू का बेटा है ।
“जी साब । सामान कहाँ पहुँचाना है ?”
अरे बस ,यहीं पोस्ट आफिस के सामने वाली गली तक ....सामान थोडा ज्यादा है इसलिए 70 रुपये ले लेना ।
पर यह तो चन्दर की कालोनी थी ।किसी ने पहचान लिया तो ! चन्दर ने ठेले में लगे शीशे में अपने आप को देखा ।

“अरे कोई नही पहचानेगा ... फिर डरने की की क्या बात है ।सामान उतारकर तुंरत लौट आयेगा ।जिंदगी में खुद की मेहनत के पहली बार 70 रुपये आ रहे हैं ।इस ग्राहक को मना करना बिल्कुल ठीक नहीं होगा ।“

“ठीक है भाई “सामान रखो और पता बताओ ?
”सी-5/11”
चलो कम से कम यह तो अछ्छा है मेरा घर डी ब्लाक में है।चन्दर ने मन ही मन में सोचा ।
वह सामान लेकर चल पडा ।गजब का उत्साह था ,चमक थी ।सोचा था कि 70 रू मिलेंगे ।बापू का फ्रेम तो कम से कम आज ही आ जायेगा ।
चन्दर अपना ठेला लेकर कालोनी में पहूंच गया ।उसने अपने चेहरे को कपडे से ढक लिया ।आंखो मे कमाने की ललक थी तो वहीं पकडे जाने का डर भी।अजीब सी संशय की स्थिति थी ।मानो कि कोई चोरी कर रहा हो ।अचानक सामने से एक जाना पहचाना चेहरा नजर आया ....अरे यह तो मेरी बहन है।
चन्दर के हांथ कांपने लगे ।लगा बहन ने उसको पहचान लिया ।हाथ भय से कांपने लगे ।डर और शर्म के कारण चन्दर सडक पर ही रूक गया।संकरी गली में पीछे ट्रैफिक जमा होने लगा ।
“अरे ओए रिक्शा “आगे बढो।एक जोर की आवाज आई पर चन्दर नहीं हिला ।
”लडकी देख के रूक गया ....साला “...ओए चल वे आगे ।किसी नें हंसते हुए कसीदे जड दिये!

अरे भाई बहुत देख लिया अब चलो भी.....ग्राहक भी परेशान होकर बोला।
“ए मिस्टर । कहाँ ध्यान है?”

ये तो स्वंय जतिन बाबू थे ।
पिताजी ------------मन ही मन में चन्दर का ह्रदय बोल पडा ।पर शब्दों को होठों का सहारा न मिल सका ।
अबे ठेले बाले अपनी औकाद देख...घर में माँ बहन नही है तेरी ...।जो ....॥
जतिन बाबू की आंखे गुस्से से तिलमिला रही थी ।
“जी साब मै तो यूँ ही....”
“नालायक चुप ....।कह कर जतिन बाबू ने आखिरकार ठेले वाले के थप्पड रसीद दिये ।

चन्दर ने अपनी आंखो के आसूँ और ह्र्दय की सच्चाई तो छुपा लिया पर चेहरे पर लगी नकली मूंछो ने सब कुछ बयाँ कर दिया।जतिन बाबू कभी चन्दर को देखते तो कभी हाथ मे लिए ठेले को ।अचानक उनकी नजरों में सुबह का दृश्य आ गया ।
“माँ ,आज मै कुछ कमाकर लाऊंगा “
”पिता जी ,मेरी नौकरी लग गई “
जतिन बाबू वहीं सडक के किनारे बेंच पर बैठ गये ।चन्दर के हाथ में अभी भी ठेला था ,हिम्मत करके वो आगे की ओर चल दिया ।शायद किसी ने नहीं पहचान पाया कि ठेले वाला ,थप्पड मारने वाले का ही बेटा था।

--“भ्रमर कुमार”---

Friday, March 09, 2007

एक उदास सुबह

आसमां के बादल के पीछे ;
परियों के उस झुरमुट के बीच में
खडी एक प्यारी सी परी !!!!

घटा से बाल हैं जिसके;
दमक बिजली की जैसी है
कमल के फूल सी रंगत ;
हंसी मोती के जैसी है !!

मासूमियत ऐसी कि जैसे;
नन्ही गिलहरी हो;
बातें ऐसे जैसे फिजा ;
उससे ही रौनक हो ॥

बहुत देखा था बचपन में
पतंग को बादलों में छिपते-छिपाते।
और जब हाथों की डोर टूट जाती थी;
एक “उदासी”संग मेरे छ्त पे
साथ रह जाती थी।

आज फिर “परी” मेरी
वही अठखेलियां करती !
आती है और फिर उड् जाती है
सपनो से मेरे!!!

फिर आंख खुलती है
हकीकत पास आती है
हर सुबह यूहीं
इक उदासी साथ जाती है !!!!

Thursday, February 22, 2007

इंसानो की तकदीरों मे चांद नही होता है

शब्द सरल थे ,अर्थ एक था ;
था उसका ही चेहरा ।
फिर भी कोई समझ न पाया ,
यह पागल क्या लिख बैठा !

बेलगाम थी कलम ;
कलम हंस-2 कर बोली ।
किधर चली “भ्रमर” तेरे नयनो की डोरी,
कहां खोये हो इधर न कोई कन्या,काशी;
या फिर तुम भी बतला दो वो बात जरा सी ॥

क्यों राते अब दिन को, और दिन अब रात बुलायें ।
मन ही मन मे पगले क्यों तू मुस्काये !
पतझड की पत्ते भी,तुझको फूल दिखे हैं !
राहों के थे जो सब दुश्मन ,अब दोस्त लगे हैं

वो काले बादल तक अब कुछ-2 छटा बिखेरे !
बुझे दिये की कालिख से तू क्यों नयना जोडे !
और दर्पण से बात करे फिर चुप हो जाये ।
कांपे तेरे होंठ ,मगर दिल मुस्काये ॥

झूठ अगर कह्ती हूँ तो मै चलती चलती रूक जाऊंगी
और अगर हूँ सच्ची तो तुझसे कुछ सुनकर जाऊंगी ॥
जो कहना था कलम ,कलम खिल-2 कर बोली ;
लगा चिढाने आई हो स्याही बनके एक छोरी !!


मै बोला........
हाँ सुन !
मुझको भी चांद मिला है ।
कई दिनो से छ्त के ऊपर ,
खिला –खिला है ॥
रात बेबफा खो जाती है फिर भी दिखता है ,
सुबह-2 सागर की लहरों पर वो चलता है ॥
उसके चेहरे पर भी है एक दाग जरा सा ।
श्वेत गुलाब पर बैठे ,एक भंवरे के जैसा ॥


वो जब हंसे लगे मोतियों ने एक धार बनाई !
उसके रोने पर मेरी धडकन रूक जाये !
और जब मेरी ये नजरे उससे मिल जायें;
वही उड़ रहे काले बादल में वो छिप जाये
फिर कभी -2 खिडकी के पीछे जाके हंसती है ;
और वहीं उसी ओट से मुझको तकती है ।

पर ऐ दोस्त, कलम !
सच टूटा और रूठा सा
मेरे आंगन के एक सूखे से पौधे सा ।

चांद मिला था ,थी पूरनमासी,
उस दिन था वो पूरा !
अगले दिन ही काटा हिस्सा ।
हुआ चांद अधूरा ॥

फिर मावस की काली छाया
एक दिन आ जाती है !
दीवाने के पास सिर्फ कुछ
यादें रह जाती है....॥

दूर बैठ के बस इतना कहता ।
पत्थर की मूरत मे कोई घाव नहीं होता है
इंसानो की तकदीरों मे चांद नही होता है ।

Thursday, January 11, 2007

उम्मीद..॥

उम्मीद
लेखक :-भ्रमर कुमार

31 दिसम्बर 2005,एक बार फिर धुंध से भरी हुई सर्द रात,कोहरे ने धरती तो कुछ इस तरह अपने आगोश में लिया कि लगा प्रकृति की सफेद रजाई ने पूरे आसमान को ढक लिया हो और उस रजाई के बाहर की यह धरती........बिना बोले सामना कर रही है कडाके की सर्दी का । हड्डियों को गला देने वाली ठंडी हवाओं को भी अपना वीभत्स रूप
आज ही दिखाना था । प्रकृति ने अपनी करवट से प्राणियों को ठहर जाने के लिए कह दिया..! लेकिन धन्य हो मनुष्य.....जिसने समय बनाया और इस समय को आदेश दिया कि कभी किसी को ठहरने मत दो।समय के उसी धुरी पर क्षण ,दिन ,महीने और साल बीते ।और आज फिर आया एक नये साल के आने का जश्न ........। तो क्या हुआ कि प्रकृति जश्न मनाने से रोक रही है। मौसम से 2-2 हाथ करने को हम शहरवासी बिल्कुल तैयार हैं...हमारे पास तेज सुर में बजता संगीत है ,रंग-बिरंगी गर्म पोशाकें है,खुशी जाहिर करने के लिए पटाखे हैं,रोशनी की जगमगाहट है ;माहौल को मदहोश करने के लिये विह्स्की के जाम और थिरकते हुए कुछ खूबसूरत इंसान । शायद अंदर से आत्मिक दुख हैं फिर भी मन तो खुश है..हमें हंसाने के लिये तरह तरह के specialist लाये गये हैं। हम दो मिलकर किसी तीसरे पर जोर-2 से हंसते हैं।

बाहर का एक इंसान अचानक से बेतुका सा प्रश्न कर बैठा

----क्या बात है भाई साहब ! बडे खुश नजर आ रहे हो ?
अचानक 30 तारीख तक चेहरे के साथ चलने वाला तनाव ,31 की रात आते ही न जाने कहाँ ,कब गायब हुआ । यह गायब हुआ है या दिखाई नही दे रहा ? या फिर हम नजर उठा कर उस तरफ देखना नहीं चाह्ते ?

----भाई साब खुश क्यो नही होंगे...नया साल जो आ रहा है।और इसी के साथ आ रही है एक आम आदमी की उम्मीद ..कि जैसे आज खुश हैं सारे साल रहें । युंही हंसते –खेलते ,नाचते गुनगुनाते वक्त बीत जाये।

और फिर अगर अगर इसी उम्मीद पर जिंदगी के कुछ पल हंसी से गुजार दिये जाये तो फिर इसकी फिक्र किसे ????


31 दिसम्बर 2006;एक बार फिर कोहरे की सर्द बूंदे कुछ ज्यादा ही सर्द हो चुकी हैं । अंधेरा इतना कि लगा ईश्वर के दिये के नीचे की कालिख यहीं किसी सतह पर जम गयी हो । निशब्द सन्नाटे के बीच कभी -2 कुत्तो के भौंखने की आवाज ,वक्त वही रात के 11 बजकर 30 मिनट का ; किसानों का एक झुरमुट कम्बल के अभाव में आग तापता हुआ ,और साथ ही कोसो दूर शहर की रोशनी की ओर टकटकी लगाकर देखते हुए..

उनमें से कुछ युवा भाग्य की लकीरों को दोषी बता रहे हैं तो कुछ वृद्ध इसी को पूर्व जन्म के पापों का फल और शहर वालों के पूर्व जन्म के पुण्य का परिणाम। आंगन में जलती हुई एक मिट्टी के तेल की कुप्पी अपने पूरे सामर्थ से हवा के साथ जंग लड रही है....परंतु गांवो में हमेशा की तरह एक बार फिर पवन का प्रहार रोशनी पर भारी पडा और दिया बुझ गया ...।

दूर शहर में एक जोर के पटाखे ने गांव की एक अनपढ बुढिया को जगा दिया ..
-------“लागत है चोर आई गए....गोली दागी राहे “
बुढिया संशय भरे भाव में बोली.

----चुप्पै सोई जाओ चाची ......नया साल शुरू हुआ ताहि तो पटाखा जलो है शहर में.।
बुढिया फिर कम्बल मे लिपटकर टूटे हुए खटोले पर सो गयी ....अचानक से फिर वही पुराना सन्नाटा ,फिर वही निशब्द वातावरण ,न नये साल की कोई मुबारकबाद ,न ही खुशी का कोई माहौल । नींद न आते हुए भी मैने कम्बल के पीछे अपना पूरा चेहरा छुपा लिया।
“ऐसा ही होता है जब उम्मीदें भी जल कर खाक हो चुकी होती हैं और लोग अगले बरस की बजाये अगले जन्म का इंतजार करते हैं “

Wednesday, October 04, 2006

बुरा करो ,बुरा देखो और बुरा सोचो

gadhya

गांधी जंयती पर विशेष

“बुरा करो; बुरा सोचो; बुरा देखो”.... (लेखक-पवन कुमार “भ्रमर”)





अक्सर कुछ मानवीय विचारधारा के लोग सदा संदर्भित व्याख्या के साथ मुझसे मानविकी पर विचार करने के लिये चले आते हैं और मै भी विना किसी संकोच के उन सब को मानविकी के के बडे-2 लेक्च्रर देने लगता हूँ ।



आज का विषय था “बुराई करना”। यहाँ बुराई करने का तात्पर्य सिर्फ पीठ पीछे बुराई करने से है।भाषा में कमजोर लोगों को बताना चाहूंगा कि चुगली करना;ख़ुन्न्श निकालना;वचन बदलना (धातु की अनुपस्थिति में और उपयुक्त समय देखकर) भी इसी इसी विशिष्ट कला के प्रारूप हैं।



जिस समय ईश्वर प्रक्रति के जीव-जंतुओ का निर्माण कर रहा था;उसने प्राणियों की पाचन व्यवस्था का भी पूरा ध्यान रखा ।भैस ,गाय ,गधा ,उँट,बकरी को खाना खाने के बाद जिस प्रकार “जुगाली” करने की प्राकृतिक व्यवस्था दी गई;ठीक उसी प्रकार मनुष्यों को चुगली करने की। आप अक्सर खाने के बाद अपने आप को सहपाठी ,सह्चर,पडोसी,बॉस की बुराई करते हुए पाऎगें।



दरअसल “चुगली करना” भी अपने आप में अत्यंत आन्नददायक विषयवस्तु है।जिस प्रकार माँ अपने सफल बेटे को देखकर ,पिता अपने कर्तव्यों को पूर्ण होता देखकर,बहनें रक्षाबन्धन का उपहार देखकर,और अंग्रेज हिन्दुस्तान जैसे देशों को आजाद करके हार्दिक प्रसन्न होते हैं ,ठीक उसी प्रकार चुगलखोर अपनी चुगली भरी बातों में दूसरों को फंसाकर खुश होते हैं। “वास्तविकता में चुगलखोर वह है जो यह जानता है कि जिन सिद्धांतो का वह उपदेश दे रहा है वे झूठे हैं तथा जो लोग उसे सुन रहे हैं वो महामूर्ख हैं ।“ चुगली करने से प्राप्त हुए असीम आनन्द को वह व्यक्ति कभी नहीं प्राप्त कर सकता जिसने जिन्दगी में कभी भी चुगली न की हो ।

यहाँ मेरा “मन की भडास” और “चुगली” के अंतर को स्पष्ट करना बहुत आवश्यक हो गया है।वास्तव में “मन की भडास” निकालना अपने मन को शांत करने के लिये किया जाता है।इसमें कहीं न कहीं स्वार्थ अवश्य होता है परन्तु “चुगली” तो निश्वार्थ रूप से की जाती है ।हम दूसरो की बुराई उस समय भी कर सकते हैं जबकि हमें उससे कोई लाभ न हो रहा हो ।



वैसे तो “चुगली करना” ही पूर्णरूपेण प्राकृतिक क्रिया है परन्तु इनमे भी कुछ लोगो की चुगली करना” Basics सीखने जैसा है।बच्चा अपने भाई बहनो की चुगली ;किशोर का अपने अध्यापक की चुगली ,युवावस्था में “गर्लफ़्रेड युक्त” साथियो की “गर्लफ़्रेड रहित” साथियों द्वारा चुगली ;नौकरी मे बॉस की चुगली ; रिटायरमेंट के बाद पत्नी की चुगली ;और म्रत्यु समीप देखकर भगवान की चुगली करना एक अछ्छे चुगलखोर के सफल सफर में पडने वाली सीढियां है।

अब इससे आगे भी पढ्ने की या फिर सुनने की इछ्छा हो रही है तो बस इतना कहूंगा कि “अछ्छे अवसर बार -2 नही आते”।सुबह उठते ही डायरी में रूटीन वर्क बना लें कि आज किसकी,कम से कम कितने लोगों के सामने चुगली करनी है।आखिरकार आप भी तो इस “कलयुग” के काले भद्र पुरूष है और आपका भी परम कर्तव्य है कि आप भी “बुरा करो; बुरा सोचो; बुरा देखो”....को युक्तिसंगत बनायें.।

Saturday, August 05, 2006

मै और मेरा प्रधानमंत्री पद

जो लोग मुझे काफी करीब से जानते हैं ,(यधपि ऐसे मूर्ख काफी कम है),उन्हे यह पता है कि मै “नेता” बल्कि सही कहें तो “नेताजी” के नाम से अधिक प्रसिद्ध हूँ ।यह नाम मुझे उस समय तथाकथित मित्रों द्वारा मिला जो अक्सर मेरे “रंग दे बसंती” के रंगीन विचारों को सुन-सुन कर तँग आ गये थे।उन कमीने दोस्तों ने तो सजा दे दी परंतु मै चार वर्षों तक इस सोच मे पडा रहा कि आखिर मुझे यह नाम क्यूँ मिला ?
परंतु जिस प्रकार बुद्ध को सारनाथ मे ज्ञान प्राप्त हुआ ;महावीर स्वामी को कुशीनगर मे जीवन की सत्यता के बारे मे पता चला ;ठीक उसी प्रकार मुझे सरकारी कँपनी मेँ आते ही ज्ञान प्राप्त हो गया ।एक कहावत है कि पवन ,पानी और प्रतिभा अपना रास्ता खुद खोज लेते हैं ।पवन मेरा ही पयार्य है ,पानी मै खूब पीता हूँ और प्रतिभा मुझ में कूट -2 के भरी हुई है।मैने सरकारी कंपनी मे आते ही उक्ति को चरितार्थ किया और कँपनी की युनियन को खोजना प्रारँभ कर दिया ।लोगो ने हमसे हमारा परिचय पूछा ।हमने क्या कहा यह बाद की बात है पर पहले मै हर सफल व्यक्ति के तीन विशिष्ट गुण बताना चाहूंगा----
1-अच्छा वाचक
2-अच्छा स्रोता
3-अच्छा प्रसशंक

अच्छा वाचक :-बात सीधे न कह्कर घुमा फिरा कर कहना चाहिए ।यदि आंग्ल भाषा पर नियंत्रण हो तो सोने पर सुहागा .....क्योकि सुनने वाले 10% ही आपको समझ सकेंगे कि आपने क्या कहा बाकि के 90% आपकी आवाज और भावभंगिमा देखकर एक दूसरे से खुद को ज्यादा बुद्धिमान दिखाने के लिये कहेगे “इटस एक्सीलेंट”
अच्छा स्रोता :बहुत जरूरी है ! क्यूँ ??? जरा नम्बर 3 पढे ।
अच्छा प्रशंसक :-जिन्हे भाषा का कम ज्ञान है या जो अक्सर नकारात्मक प्रवत्ति से घिरे रह्ते है वो मेरे प्रशंसक शब्द को “चापलूस” में बदल देंगे ।परंतु अगर आप प्रगति के इछ्छुक हैं तो आप अपने से ऊपर वाले की जमकर प्रशंसा करिये । स्त्रियों से कहें कि वो बुद्धिमान है और पुरुषों से कहे कि वो लगातार handsome होते जा रहे है।आपके मुख से ऐसे वचन सुनकर वो ठीक उसी प्रकार प्रसन्न होंगे जिस प्रकार रामदेव महाराज अपनी दवा के बारे में,ग्रेग चैपल उंगली दिखाने में ,सिद्धू जी बिना अर्थ की लोकोक्त्ति सुनाने में ;और वित्त मंत्री कीमते बढाने में खुश होते हैं।

अब लोगो ने जैसे ही मेरा परिचय पूछा हमने तपाक से एक शेर जड दिया: बोले
“हम न गुल हैं न फूल है जो महकते जायें
आग की तरह है जिधर जाये दह्कते जायें ॥

इतना कहते ही 2000 रु प्रतिमाह पाने वाले मजदूर संकट्मोचक मुझे ही समझ बैठे ।परन्तु मेरे लिये यह कूटनीति का प्रथम चरण था ।मुझे जार्ज रेमँड की अग्रेजी पुस्तक की दो लाइने आज तक याद हैँ
“कूटनीतिज्ञ एक ऐसा राजनीतिज्ञ है जो स्वयँ को राष्र्ट्र की सेवा में अर्पित कर देता है; जबकि राजनीतिज्ञ एक ऐसा कूटनीतिज्ञ है जो राष्ट्र को अपनी सेवा में अर्पित कर देता है.”

कुल मिलाकर यदि मेरे उपर्युक्त कथन की विवेचना की जाये और समझा जाये तो मेरे लिये राष्ट्र आदि के कोई मायने नहीं है।मै मनुष्यों द्वारा बनाई गई रेखाओं को ठीक उसी प्रकार नही समझ सकता जैसे एक टेक्निकल concept को मैनेजमेंट की कुर्सी पर बैठा इँसान नही समझ सकता ।
खुद को बदलने से मोह्ल्ला बदल जाता है ;मोह्ल्ला बदलने से गाँव;और गाँव बदलने से देश बदल जाता है ;ठीक उसी प्रकार से अपनी प्रगति से मोहल्ले की प्रगति;मोह्ल्ले से गांव और गांव से देश की प्रगति हो जायेगी ।मूल मे अपनी प्रगति अतिआवश्यक है।कुल मिलाकर “स्वकेन्द्रीय सोच “अर्थात स्वार्थी होना ही प्रगति करने का मूल स्तम्भ है।
मजदूर यूनियन में अध्यक्ष पद संभालते ही मैने एक शब्द रटा और उनके दो समर्थक नेताओं के नाम रटे ।शब्द था “समाजवाद “और नेता थे “मार्क्स और लेनिन”।ध्यान रहे भारतीय “लोहिया” ;”गांधी” या “विनोवा “ का नाम लेना ,मतलब जनता कि नजरों मे स्वंय के स्तर को गिराना।जब तक आपकी बातों मे “राविंसन “”मैल्कम स्मिथ “”रिलैरो मैक्सम” या इससे भी अधिक कठिन नाम नही आते ,लोगो के सामने आपके विचारो की कोई औकात नहीं ।एक और विशिष्ट बात वह यह कि आप अपनी बात को कुछ अधिक कलात्मक,विचारपरक प्रदर्शित करना चाह्ते हैं तो आप अपने नाम के आगे “सर” और पीछे “बंशाली”,”चटर्जी “,”दास” “चट्टोपाध्याय “ या फिर “गंगोपाध्याय “ लगाना प्रारंभ कर दें।

एक अच्छे नेता का प्रथम कार्य होता है “किसी अच्छी सी सडक पर जाम लगबाना “ या फिर किसी भिखारी के तन पर ढके एक मात्र वस्त्र को छींनकर उस कपडे का पुतला बनाकर उसे जलाना ।पुतला जितने बडे आदमी का जलायेगे आप भी उतनी ज्यादा प्रसिद्धि पायेंगे।
लेकिन मैने तो प्रसिद्धि पाने का एक अलग ही तरीका अपनाया ।मैने एक मरे हुए अति प्रसिद्ध आदमी का पुतला जलाया ।यह प्रसिद्ध आदमी “गांधी “था ।वैसे भी यह वो बेचारा इँसान था जिसने पूरी जिन्दगी खुद को खूब जलाया और हिन्दुस्तानी जनता देश की सबसे बडी समस्या का उत्तरदायी इसे ही मानती है ।जनता की इसी “मूर्खता” का मैने जमकर फायदा उठाया ।यहाँ एक और शिक्षा देना चाहूँगा ;अगर जिन्दगी में कभी कोई गलती हो जाये तो उसे कभी मत स्वीकारो ;कभी मत कहो कि गलती मेरी या हमारी थी ।
कहना सीखो कि गलती उसकी थी ;या ISI की थी ;पाकिस्तान की थी ,और अगर कोई ना मिले तो “गांधी”की थी।कुल मिलाकर आदर्शवादी गांधी का मैने जमकर फायदा उठाया।
मैने यह सारे मंत्र सीख लिये और अपनी युनियन के साथ बाहर की युनियन कार्य में भी बढ-चढ कर भाग लेना प्रारंभ कर दिया था;गाँधी जी से खुले आम दुश्मनी ने मुझे बहुत प्रसिद्ध कर ही दिया था ।मुझे किसी भी बात का डर भी नही था क्योंकि मेरे दुश्मन “अहिंसक” थे ।
मेरे जबरदस्त विचारों से प्रेरित होकर कुछ महापुरुषों ने मुझे “वर्तमान का सिपाही” की होने की संज्ञा दे डाली;और आगामी लोकसभा में चुनाव लडने का विचार ।मै प्रथमता नैतिकता के आधार पर बोला कि मै देश के इतने बडे भवन में बैठने लायक कहाँ हूँ परंतु मेरे इस कथन को वो सत्य ना मान ले इसलिए साथ ही जोडा कि आप बुद्धिमान है ;जो आप ठीक समझते है वही उचित होगा।वैसे सत्य कहूँ तो उतना मूर्ख राजनीतिज्ञ मैने आज तक नही देखा ;15 वर्षो से सिर्फ पार्टी का स्यंयसेवक बना बैठा था।कोई लाभ का पद मिलते ही उसे ठुकरा देता..........।मै मन ही मन अति प्रसन्न था।
अब मैने जाते ही अपनी कंपनी मे अपने इस्तीफे की कयावत प्रारंभ कर दी;इसके लिये सर्वप्रथम मैने एक बडा घोटाला किया;उददेश्य था आगामी चुनावों के लिए पैसे जुगाडना।ळोगो ने जैसे ही मेरे ऊपर प्रश्न किये मैने घडियाली आसूँ बहाते हुए इस्तीफा दे दिया। युनियन पहले से ही मेरे साथ थी ।कंपनी मे हड्ताल शुरू हो गयी।मै चार दिन बाद प्रेस से मिला और साथियो से काम पर बापस जाने का आह्वान किया ।

लोगों ने मेरी बात मानी पर साथ ही साथ एक नारा भी दिया ;”छछूदंरलाल तुम सँघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं “मैने भी साथ में कह दिया आपके इस साथ की जरुरत समय आने पडेगी ।
अब चुनावों का समय पास था । साम,दाम,दण्ड भेद की सारी नीतियाँ मैने अपना ली थी।अपने चुनावी अभियान की शुरुआत मैने जुग्घी-झोपडी में राखी सावंत का बहुमुखी न्रत्य करा किया;मै जांनता था कि 90% वोट यहीं से पडेंगे ।वैसे भी मै कला का बहुत
बडा प्रसशंक हूँ।

अंतत: मै चुनाव जीत ही गया ;मेरे साथ मेरे मुहल्ले का रामविलास और बगल वाले मुह्ल्ले का सिबू भी चुनाव जीता था। दोनो निर्दलीय थे इसलिए सबसे पहले इन दोनो को मैने अपनी पार्टी में ले लिया;बैसे इन दोनो का पूर्व मे किसी की भी सरकार में कैबिनेट मंत्री का पद पक्का रह्ता था।अब हम तीन थे “रामविलास,सिब्बु जी;और छ्छूंदरलाल”....

मैने पार्टी का नाम तीनो नामो को जोडते हुए रखा “लाल राम जी”।सयोंग से इस बार त्रिद्लीय संसद बनी ।दो बडे-2 दल बहुमत से दूर थे ,बाकियों को जोड्ने से बहुमत से सिर्फ 3 कम ।मै अपनी value समझ चुका था ।मैने छोटे-2 दलों को दिवास्व्प्न दिखाने शुरु किये और उन्होने देखने ।मैने सभी को मंत्री बनाने का वायदा कर डाला।और संसद में खुद की अध्यक्षता में सबसे बडी पार्टी की लिस्ट राष्ट्र्पति को पकडा दी।
अब शपथ समारोह और हमारे प्रधानमंत्री बनने में दो दिन का अंतर था............॥आगे की सुखद या दुखद घटना अगले अंक मे......................॥