कहूँ शब्दों से क्या मै बस;
गा बैठा एक छंद ॥
दूर देश में बैठे बैठे बस
याद आया एक अनुबंध ॥
चिठ्ठी पाती न होती थी
न हो पाती थी जब बात
तभी Canteen के गुप्ता जी की
एक आती थी आवाज ॥
हम दौडे दौडे जाते थे
सुनके मम्मी की आवाज।
और Mess में गिरते थे आंसू
छलक पडते थे जज्बात ॥
कांच तोड के टोपो करना
और “खुद की मेहनत” बतलाना।
क्लास में बैठी अग्र लाइन पर
नजरें खूब घुमाना ॥
“फूल तोडना मना” लिखा हो
वहां से उसे तोड के लाना
और गुलाब की उस डंडी को;
Room-mate को पकडाना ॥
दिल के सर्किट खूब समझना
पर Tronix समझ ना आये
LAN, WAN समझा हमने तब
जब Share Folder आये
कलरव की मस्ती में
युवा मंच खूब हंसता था।
उस एक रंगमहल के आगे
सब कुछ लगता “सस्ता” था ॥
एक समोसे के छह हिस्से;
और जयसिंह की वो चाय;
और पैसे न देने पे;
पंडित की लगती “हाय”।
फिर एक दिन ऐसा आता था ;
जब खूब मार पडती थी
और होंठों पे हम सबके ;
एक हंसी रहती थी ;
क्योंकि लातों की मार के आगे
दिल का प्यार आ जाता था ॥
और दर्द ज्यादा होने पे हम सबको
गले लगाना आता था॥
आठ पचास पे सोके उठना ;
और नौ पे yes sir कहना ।
फिर दस की Class में
बची नींद को पूरी करना ॥
इस पर भी गर Teacher पकडे;
तो मुंह धोकर फिर से सोना
और नींद गर ना आये
तो फिर सपनों में खोना ॥
हंसी आती है आज जब
Boss Project Line बनाता
याद आता वो वक्त जब
CT का एक दिन रह जाता ,
और chapter सात देखकर
होश उडा करते थे ।
तब मेरे जैसे कई दोस्त ;
काजल पे मिला करते थे।
और डिनर के बाद शुरु करेंगे
हम ये सोचा करते थे
खाने के तुरंत बाद नही पढना होता है;
यूंही फिर 11 बजते थे ॥
फिर आंखो की नींद भगाने हम;
”चीची” के पास जाते थे ;
और फिर वहां उसी shed में
हम फोटोस्टेट रटते थे।
बस ऐसे ही उसी जगह से;
हम एक दिन बाबू बन बैठे।
कहने को तो बहुत है लेकिन
बक्त भागता जाता है
और खडे होकर हम सब पीछे ....तकते हैं
कभी आगे जाने वालों को .....कभी पीछे छूटने बालों को
बस एक लंबी सांस के बाद;
कलम ठहर जाती है
भीनी पलकें और मुस्कान
.......साथ साथ आती हैं ॥
Tuesday, May 08, 2007
Sunday, March 11, 2007
कर्म
कर्म की प्रतीक्षा में शायद जीवन नष्ट हो जाता है परन्तु इंसान को क्षमता के अनुसार कर्म नहीं मिलता । शायद वह इसे कभी नहीं ढूंढ नहीं पाता या फिर कर्म स्वंय उससे दूर भागता ।चन्दर बी.ए. पास था वो भी प्रथम श्रेणी में । क्लास में अव्वल रहता ,पिता जी साधारण से पोस्ट आफिस में क्लर्क़ थे । घर पर एक बडी बहन थी जो राजनीति से एम.ए करके पास के स्कूल में छोटे बच्चों को पढानें लगी थी ।
चन्दर से सभी को बहुत आशायें थी और पढाई के समय वो इन सभी आशाओं पर पूर्णतया खरा उतरा ।परन्तु अब समय निकल चुका था ।तेज तर्रार चन्दर को निकम्मा ,मक्कार की संज्ञा दी जाने लगी ।कारण वही अधिकतर युवाओं की तरह वह भी बेरोजकार ।
चन्दर रोज सुबह जल्दी उठता ,नहाता ,ईश्वर का ध्यान करता ,फिर माँ के कोमल हाथों और पिताजी की आशाओं का आशीर्वाद लेता और अपनी फाइलें लेकर निकल पडता । परंतु यह सुबह का चित्र था ।
सुबह का सूरज शाम होते-होते पीला हो जाता । घर के अन्दर घुसते ही थका हारा चन्दर लेट जाता ।बिखरे हुए बाल और लटका हुआ चेहरा बिना बोले ही “हार” की दास्तान कह देता है। पिताजी छ्डी पर हाथ का जोर और बढाकर अक्सर धीमी आवाज में सिर्फ एक ही बात करते “लाख कहा था सांइस लेने को ,तब तो पुरातत्व में दिलचस्पी थी साहब को.....सांइस के युग में इतिहास.........बेबकूफी इसे ही कहते हैं”
अरे भाई!जिन्दगी कभी दिलचस्पी से नहीं चलती ज्ञान बाबू का बेटा भी इन्ही के साथ का था ,इंजीनियर हो गया ।20000 कमाता है और एक ये साब ,20 रुपये ही ले आयें ।
चन्दर को ये बातें बुरी नही लगती ,वो जानता था माँ बाप ये बातें दिल से नहीं कहते ।यह तो संसार का नियम है कि दिल की भड़ास किसी न किसी पर निकाली जाती है और अगर उस पर गुस्सा होने से पिता जी के दिल का बोझ कम होता है तो बह सौभाग्यशाली है कि किसी तरह तो वह उनके काम आ सका । जीवन में एक विश्वास और एक दिन उसका भी होगा इस बात की आशा ,फिर पहली ही तनख्वाह से पिता जी के चश्मे का नया फ्रेम,माँ के लिए एक नई साडी और बहन के लिए एक मैड्म बाली पर्स ..............सिर्फ यही सपना था जो चन्दर के चेहरे पर अक्सर मुस्कान ले आता ।
परंतु हकीकत कुछ और कहने लगी ,छ्ह और महीने बीत गये परन्तु चन्दर को कोई नौकरी नही मिली ।वह बहुत परेशान रहता ।आज तो उसके मन को बहुत ठेस लगी ।पिता जी ने साफ तौर पर कह दिया कि अब वो उसे और नहीं ढो सकते ,नहीं नौकरी मिलती तो कोई छोटी मोटी दुकान पर काम कर लो,परंतु चन्दर अपने पैरों पर खडा होना चाह्ता था ।उसे यकीन था कि वह एक न एक दिन खुद की मेहनत के आधार पर आगे बढेगा ।
विचारों की कोई सीमा नही होती ।यह विचार ही किसी मनुष्य को जीवन की राह और उनके संकल्प दिखाते हैं । बेरोजकार व्यक्ति के विचार और कल्पनायें बहुत ऊंचे होते हैं ।ये लोग अपने आप को बडा साहसी समझकर अक्सर अपने आप को प्रधानमंत्री से ऊंचे पद पर या भ्रष्टाचार मिटा देने वाले अवतार के रूप में देखते हैं,वही प्रधानमंत्री या उससे ऊंचे पद पर बैठे लोग सदैव पद छिन जाने के डर से भयभीत रहते हैं।जिसके पास वस्तु है वह उसके छिन जाने से डरता है वहीं दूसरी ओर जिसके पास नहीं है वह जिन्दगी पर उस डर के पास जाने के लिए हाथ पैर मारता रहता है ।
परंतु चंदर इन सब से अलग था ,उसे काम में कोई अंतर नही दिखाई देता ।बह मजदूर से मालिक के अंतर को समझने में नाकामयाब था ।सडक पर चलते हुए उसकी नजर बोझ खींचने वाले एक व्यक्ति पर पडी।अचानक मजदूर ने दुकान के सामने अपना ठेला रोक दिया ---
--“यह इसी दुकान का सामान है”—दुकानदार नें पूछा
--”हां साहब” पास के गोदाम से लाया हूँ।”
--ठीक है....क़ितने पैसे हुए?
--जितने दे दो साब ..ज्यादा ही होंगे
दुकानदार ने मुस्कुराते हुए 50 रू आगे बढा दिए ,परंतु दूर खडे चन्दर के पैर भी अनायास ही दुकान की ओर चल दिये ।
50 रूपये में जिन्दगी चला लेते हो ? चन्दर ने ठेले वाले से पूछा ।
साहब,3 चक्कर रोज चला लेता हूँ ,100 से ज्यादा कमा लेता हूँ ,महीने का यही कोई 3000 । कम से कम माँ बाप पर बोझ नही हूँ ।
---पढे लिखे हो ? चन्दर ने फिर पूछा ।
हाँ साब ! माँ बाप ने बहुत मेहनत से पढाया पर नौकरी नहीं मिली....इतना कहकर ठेले बाले की आंख रूआसी हो आई ।
इससे पहले चन्दर के होंठ कुछ कह पायें ,पैर स्वंय घर की ओर तेजी से चल दिये ।मानो लगता था कि चन्दर को जबाब पहले से ही पता था बस प्रतीक्षा थी कानों से एक बार उसे सुनने की .........................!!
एक अजीब से संकल्प के साथ आज चन्दर की सुबह हुई ।वह कुछ न कुछ कमाकर ही लौटेगा ।
उसने माँ से गर्व के साथ कहा ---माँ आज मुझे नौकरी मिल गई।इस एक लाईन ने पूरे घर के माहौल को बदल दिया ।माँ की आंखे छ्ल-छ्ला उठी ।पिताजी दाढी बना रहे थे .....वो आधी –अधूरी वहीं छूट गई,बहन जिसके पैर स्कूल जाने के के लिये निकलने को थे ,अपने आप ही मुड कर बरामदे की ओर हो गये ।दौडते हुए वो भाई से लिपट गई।
पर किसी ने नही पूछा कि चन्दर को नौकरी कहाँ मिली ।यह या तो घर वालो का विश्वास था या फिर बरसों बाद आई खुशी को जी भर के जीने की तमन्ना ।
माँ ...आज तेरा बेटा कुछ कमाकर लौटेगा ।चन्दर ने पैर छूते हुए कहा ।
पिता जी ने चंदर को गले लगाकर आशीर्वाद दिया ।
चन्दर सीधे माल रोड के गोदाम में गया ।एक ठेला किराये पर लिया और फिर नकली मूंछे ,ताकि कोई न पहचान पाये कि यह पोस्ट आफिस में काम करने वाले जतिन बाबू का बेटा है ।
“जी साब । सामान कहाँ पहुँचाना है ?”
अरे बस ,यहीं पोस्ट आफिस के सामने वाली गली तक ....सामान थोडा ज्यादा है इसलिए 70 रुपये ले लेना ।
पर यह तो चन्दर की कालोनी थी ।किसी ने पहचान लिया तो ! चन्दर ने ठेले में लगे शीशे में अपने आप को देखा ।
“अरे कोई नही पहचानेगा ... फिर डरने की की क्या बात है ।सामान उतारकर तुंरत लौट आयेगा ।जिंदगी में खुद की मेहनत के पहली बार 70 रुपये आ रहे हैं ।इस ग्राहक को मना करना बिल्कुल ठीक नहीं होगा ।“
“ठीक है भाई “सामान रखो और पता बताओ ?
”सी-5/11”
चलो कम से कम यह तो अछ्छा है मेरा घर डी ब्लाक में है।चन्दर ने मन ही मन में सोचा ।
वह सामान लेकर चल पडा ।गजब का उत्साह था ,चमक थी ।सोचा था कि 70 रू मिलेंगे ।बापू का फ्रेम तो कम से कम आज ही आ जायेगा ।
चन्दर अपना ठेला लेकर कालोनी में पहूंच गया ।उसने अपने चेहरे को कपडे से ढक लिया ।आंखो मे कमाने की ललक थी तो वहीं पकडे जाने का डर भी।अजीब सी संशय की स्थिति थी ।मानो कि कोई चोरी कर रहा हो ।अचानक सामने से एक जाना पहचाना चेहरा नजर आया ....अरे यह तो मेरी बहन है।
चन्दर के हांथ कांपने लगे ।लगा बहन ने उसको पहचान लिया ।हाथ भय से कांपने लगे ।डर और शर्म के कारण चन्दर सडक पर ही रूक गया।संकरी गली में पीछे ट्रैफिक जमा होने लगा ।
“अरे ओए रिक्शा “आगे बढो।एक जोर की आवाज आई पर चन्दर नहीं हिला ।
”लडकी देख के रूक गया ....साला “...ओए चल वे आगे ।किसी नें हंसते हुए कसीदे जड दिये!
अरे भाई बहुत देख लिया अब चलो भी.....ग्राहक भी परेशान होकर बोला।
“ए मिस्टर । कहाँ ध्यान है?”
ये तो स्वंय जतिन बाबू थे ।
पिताजी ------------मन ही मन में चन्दर का ह्रदय बोल पडा ।पर शब्दों को होठों का सहारा न मिल सका ।
अबे ठेले बाले अपनी औकाद देख...घर में माँ बहन नही है तेरी ...।जो ....॥
जतिन बाबू की आंखे गुस्से से तिलमिला रही थी ।
“जी साब मै तो यूँ ही....”
“नालायक चुप ....।कह कर जतिन बाबू ने आखिरकार ठेले वाले के थप्पड रसीद दिये ।
चन्दर ने अपनी आंखो के आसूँ और ह्र्दय की सच्चाई तो छुपा लिया पर चेहरे पर लगी नकली मूंछो ने सब कुछ बयाँ कर दिया।जतिन बाबू कभी चन्दर को देखते तो कभी हाथ मे लिए ठेले को ।अचानक उनकी नजरों में सुबह का दृश्य आ गया ।
“माँ ,आज मै कुछ कमाकर लाऊंगा “
”पिता जी ,मेरी नौकरी लग गई “
जतिन बाबू वहीं सडक के किनारे बेंच पर बैठ गये ।चन्दर के हाथ में अभी भी ठेला था ,हिम्मत करके वो आगे की ओर चल दिया ।शायद किसी ने नहीं पहचान पाया कि ठेले वाला ,थप्पड मारने वाले का ही बेटा था।
--“भ्रमर कुमार”---
चन्दर से सभी को बहुत आशायें थी और पढाई के समय वो इन सभी आशाओं पर पूर्णतया खरा उतरा ।परन्तु अब समय निकल चुका था ।तेज तर्रार चन्दर को निकम्मा ,मक्कार की संज्ञा दी जाने लगी ।कारण वही अधिकतर युवाओं की तरह वह भी बेरोजकार ।
चन्दर रोज सुबह जल्दी उठता ,नहाता ,ईश्वर का ध्यान करता ,फिर माँ के कोमल हाथों और पिताजी की आशाओं का आशीर्वाद लेता और अपनी फाइलें लेकर निकल पडता । परंतु यह सुबह का चित्र था ।
सुबह का सूरज शाम होते-होते पीला हो जाता । घर के अन्दर घुसते ही थका हारा चन्दर लेट जाता ।बिखरे हुए बाल और लटका हुआ चेहरा बिना बोले ही “हार” की दास्तान कह देता है। पिताजी छ्डी पर हाथ का जोर और बढाकर अक्सर धीमी आवाज में सिर्फ एक ही बात करते “लाख कहा था सांइस लेने को ,तब तो पुरातत्व में दिलचस्पी थी साहब को.....सांइस के युग में इतिहास.........बेबकूफी इसे ही कहते हैं”
अरे भाई!जिन्दगी कभी दिलचस्पी से नहीं चलती ज्ञान बाबू का बेटा भी इन्ही के साथ का था ,इंजीनियर हो गया ।20000 कमाता है और एक ये साब ,20 रुपये ही ले आयें ।
चन्दर को ये बातें बुरी नही लगती ,वो जानता था माँ बाप ये बातें दिल से नहीं कहते ।यह तो संसार का नियम है कि दिल की भड़ास किसी न किसी पर निकाली जाती है और अगर उस पर गुस्सा होने से पिता जी के दिल का बोझ कम होता है तो बह सौभाग्यशाली है कि किसी तरह तो वह उनके काम आ सका । जीवन में एक विश्वास और एक दिन उसका भी होगा इस बात की आशा ,फिर पहली ही तनख्वाह से पिता जी के चश्मे का नया फ्रेम,माँ के लिए एक नई साडी और बहन के लिए एक मैड्म बाली पर्स ..............सिर्फ यही सपना था जो चन्दर के चेहरे पर अक्सर मुस्कान ले आता ।
परंतु हकीकत कुछ और कहने लगी ,छ्ह और महीने बीत गये परन्तु चन्दर को कोई नौकरी नही मिली ।वह बहुत परेशान रहता ।आज तो उसके मन को बहुत ठेस लगी ।पिता जी ने साफ तौर पर कह दिया कि अब वो उसे और नहीं ढो सकते ,नहीं नौकरी मिलती तो कोई छोटी मोटी दुकान पर काम कर लो,परंतु चन्दर अपने पैरों पर खडा होना चाह्ता था ।उसे यकीन था कि वह एक न एक दिन खुद की मेहनत के आधार पर आगे बढेगा ।
विचारों की कोई सीमा नही होती ।यह विचार ही किसी मनुष्य को जीवन की राह और उनके संकल्प दिखाते हैं । बेरोजकार व्यक्ति के विचार और कल्पनायें बहुत ऊंचे होते हैं ।ये लोग अपने आप को बडा साहसी समझकर अक्सर अपने आप को प्रधानमंत्री से ऊंचे पद पर या भ्रष्टाचार मिटा देने वाले अवतार के रूप में देखते हैं,वही प्रधानमंत्री या उससे ऊंचे पद पर बैठे लोग सदैव पद छिन जाने के डर से भयभीत रहते हैं।जिसके पास वस्तु है वह उसके छिन जाने से डरता है वहीं दूसरी ओर जिसके पास नहीं है वह जिन्दगी पर उस डर के पास जाने के लिए हाथ पैर मारता रहता है ।
परंतु चंदर इन सब से अलग था ,उसे काम में कोई अंतर नही दिखाई देता ।बह मजदूर से मालिक के अंतर को समझने में नाकामयाब था ।सडक पर चलते हुए उसकी नजर बोझ खींचने वाले एक व्यक्ति पर पडी।अचानक मजदूर ने दुकान के सामने अपना ठेला रोक दिया ---
--“यह इसी दुकान का सामान है”—दुकानदार नें पूछा
--”हां साहब” पास के गोदाम से लाया हूँ।”
--ठीक है....क़ितने पैसे हुए?
--जितने दे दो साब ..ज्यादा ही होंगे
दुकानदार ने मुस्कुराते हुए 50 रू आगे बढा दिए ,परंतु दूर खडे चन्दर के पैर भी अनायास ही दुकान की ओर चल दिये ।
50 रूपये में जिन्दगी चला लेते हो ? चन्दर ने ठेले वाले से पूछा ।
साहब,3 चक्कर रोज चला लेता हूँ ,100 से ज्यादा कमा लेता हूँ ,महीने का यही कोई 3000 । कम से कम माँ बाप पर बोझ नही हूँ ।
---पढे लिखे हो ? चन्दर ने फिर पूछा ।
हाँ साब ! माँ बाप ने बहुत मेहनत से पढाया पर नौकरी नहीं मिली....इतना कहकर ठेले बाले की आंख रूआसी हो आई ।
इससे पहले चन्दर के होंठ कुछ कह पायें ,पैर स्वंय घर की ओर तेजी से चल दिये ।मानो लगता था कि चन्दर को जबाब पहले से ही पता था बस प्रतीक्षा थी कानों से एक बार उसे सुनने की .........................!!
एक अजीब से संकल्प के साथ आज चन्दर की सुबह हुई ।वह कुछ न कुछ कमाकर ही लौटेगा ।
उसने माँ से गर्व के साथ कहा ---माँ आज मुझे नौकरी मिल गई।इस एक लाईन ने पूरे घर के माहौल को बदल दिया ।माँ की आंखे छ्ल-छ्ला उठी ।पिताजी दाढी बना रहे थे .....वो आधी –अधूरी वहीं छूट गई,बहन जिसके पैर स्कूल जाने के के लिये निकलने को थे ,अपने आप ही मुड कर बरामदे की ओर हो गये ।दौडते हुए वो भाई से लिपट गई।
पर किसी ने नही पूछा कि चन्दर को नौकरी कहाँ मिली ।यह या तो घर वालो का विश्वास था या फिर बरसों बाद आई खुशी को जी भर के जीने की तमन्ना ।
माँ ...आज तेरा बेटा कुछ कमाकर लौटेगा ।चन्दर ने पैर छूते हुए कहा ।
पिता जी ने चंदर को गले लगाकर आशीर्वाद दिया ।
चन्दर सीधे माल रोड के गोदाम में गया ।एक ठेला किराये पर लिया और फिर नकली मूंछे ,ताकि कोई न पहचान पाये कि यह पोस्ट आफिस में काम करने वाले जतिन बाबू का बेटा है ।
“जी साब । सामान कहाँ पहुँचाना है ?”
अरे बस ,यहीं पोस्ट आफिस के सामने वाली गली तक ....सामान थोडा ज्यादा है इसलिए 70 रुपये ले लेना ।
पर यह तो चन्दर की कालोनी थी ।किसी ने पहचान लिया तो ! चन्दर ने ठेले में लगे शीशे में अपने आप को देखा ।
“अरे कोई नही पहचानेगा ... फिर डरने की की क्या बात है ।सामान उतारकर तुंरत लौट आयेगा ।जिंदगी में खुद की मेहनत के पहली बार 70 रुपये आ रहे हैं ।इस ग्राहक को मना करना बिल्कुल ठीक नहीं होगा ।“
“ठीक है भाई “सामान रखो और पता बताओ ?
”सी-5/11”
चलो कम से कम यह तो अछ्छा है मेरा घर डी ब्लाक में है।चन्दर ने मन ही मन में सोचा ।
वह सामान लेकर चल पडा ।गजब का उत्साह था ,चमक थी ।सोचा था कि 70 रू मिलेंगे ।बापू का फ्रेम तो कम से कम आज ही आ जायेगा ।
चन्दर अपना ठेला लेकर कालोनी में पहूंच गया ।उसने अपने चेहरे को कपडे से ढक लिया ।आंखो मे कमाने की ललक थी तो वहीं पकडे जाने का डर भी।अजीब सी संशय की स्थिति थी ।मानो कि कोई चोरी कर रहा हो ।अचानक सामने से एक जाना पहचाना चेहरा नजर आया ....अरे यह तो मेरी बहन है।
चन्दर के हांथ कांपने लगे ।लगा बहन ने उसको पहचान लिया ।हाथ भय से कांपने लगे ।डर और शर्म के कारण चन्दर सडक पर ही रूक गया।संकरी गली में पीछे ट्रैफिक जमा होने लगा ।
“अरे ओए रिक्शा “आगे बढो।एक जोर की आवाज आई पर चन्दर नहीं हिला ।
”लडकी देख के रूक गया ....साला “...ओए चल वे आगे ।किसी नें हंसते हुए कसीदे जड दिये!
अरे भाई बहुत देख लिया अब चलो भी.....ग्राहक भी परेशान होकर बोला।
“ए मिस्टर । कहाँ ध्यान है?”
ये तो स्वंय जतिन बाबू थे ।
पिताजी ------------मन ही मन में चन्दर का ह्रदय बोल पडा ।पर शब्दों को होठों का सहारा न मिल सका ।
अबे ठेले बाले अपनी औकाद देख...घर में माँ बहन नही है तेरी ...।जो ....॥
जतिन बाबू की आंखे गुस्से से तिलमिला रही थी ।
“जी साब मै तो यूँ ही....”
“नालायक चुप ....।कह कर जतिन बाबू ने आखिरकार ठेले वाले के थप्पड रसीद दिये ।
चन्दर ने अपनी आंखो के आसूँ और ह्र्दय की सच्चाई तो छुपा लिया पर चेहरे पर लगी नकली मूंछो ने सब कुछ बयाँ कर दिया।जतिन बाबू कभी चन्दर को देखते तो कभी हाथ मे लिए ठेले को ।अचानक उनकी नजरों में सुबह का दृश्य आ गया ।
“माँ ,आज मै कुछ कमाकर लाऊंगा “
”पिता जी ,मेरी नौकरी लग गई “
जतिन बाबू वहीं सडक के किनारे बेंच पर बैठ गये ।चन्दर के हाथ में अभी भी ठेला था ,हिम्मत करके वो आगे की ओर चल दिया ।शायद किसी ने नहीं पहचान पाया कि ठेले वाला ,थप्पड मारने वाले का ही बेटा था।
--“भ्रमर कुमार”---
Friday, March 09, 2007
एक उदास सुबह
आसमां के बादल के पीछे ;
परियों के उस झुरमुट के बीच में
खडी एक प्यारी सी परी !!!!
घटा से बाल हैं जिसके;
दमक बिजली की जैसी है
कमल के फूल सी रंगत ;
हंसी मोती के जैसी है !!
मासूमियत ऐसी कि जैसे;
नन्ही गिलहरी हो;
बातें ऐसे जैसे फिजा ;
उससे ही रौनक हो ॥
बहुत देखा था बचपन में
पतंग को बादलों में छिपते-छिपाते।
और जब हाथों की डोर टूट जाती थी;
एक “उदासी”संग मेरे छ्त पे
साथ रह जाती थी।
आज फिर “परी” मेरी
वही अठखेलियां करती !
आती है और फिर उड् जाती है
सपनो से मेरे!!!
फिर आंख खुलती है
हकीकत पास आती है
हर सुबह यूहीं
इक उदासी साथ जाती है !!!!
परियों के उस झुरमुट के बीच में
खडी एक प्यारी सी परी !!!!
घटा से बाल हैं जिसके;
दमक बिजली की जैसी है
कमल के फूल सी रंगत ;
हंसी मोती के जैसी है !!
मासूमियत ऐसी कि जैसे;
नन्ही गिलहरी हो;
बातें ऐसे जैसे फिजा ;
उससे ही रौनक हो ॥
बहुत देखा था बचपन में
पतंग को बादलों में छिपते-छिपाते।
और जब हाथों की डोर टूट जाती थी;
एक “उदासी”संग मेरे छ्त पे
साथ रह जाती थी।
आज फिर “परी” मेरी
वही अठखेलियां करती !
आती है और फिर उड् जाती है
सपनो से मेरे!!!
फिर आंख खुलती है
हकीकत पास आती है
हर सुबह यूहीं
इक उदासी साथ जाती है !!!!
Thursday, February 22, 2007
इंसानो की तकदीरों मे चांद नही होता है
शब्द सरल थे ,अर्थ एक था ;
था उसका ही चेहरा ।
फिर भी कोई समझ न पाया ,
यह पागल क्या लिख बैठा !
बेलगाम थी कलम ;
कलम हंस-2 कर बोली ।
किधर चली “भ्रमर” तेरे नयनो की डोरी,
कहां खोये हो इधर न कोई कन्या,काशी;
या फिर तुम भी बतला दो वो बात जरा सी ॥
क्यों राते अब दिन को, और दिन अब रात बुलायें ।
मन ही मन मे पगले क्यों तू मुस्काये !
पतझड की पत्ते भी,तुझको फूल दिखे हैं !
राहों के थे जो सब दुश्मन ,अब दोस्त लगे हैं
वो काले बादल तक अब कुछ-2 छटा बिखेरे !
बुझे दिये की कालिख से तू क्यों नयना जोडे !
और दर्पण से बात करे फिर चुप हो जाये ।
कांपे तेरे होंठ ,मगर दिल मुस्काये ॥
झूठ अगर कह्ती हूँ तो मै चलती चलती रूक जाऊंगी
और अगर हूँ सच्ची तो तुझसे कुछ सुनकर जाऊंगी ॥
जो कहना था कलम ,कलम खिल-2 कर बोली ;
लगा चिढाने आई हो स्याही बनके एक छोरी !!
मै बोला........
हाँ सुन !
मुझको भी चांद मिला है ।
कई दिनो से छ्त के ऊपर ,
खिला –खिला है ॥
रात बेबफा खो जाती है फिर भी दिखता है ,
सुबह-2 सागर की लहरों पर वो चलता है ॥
उसके चेहरे पर भी है एक दाग जरा सा ।
श्वेत गुलाब पर बैठे ,एक भंवरे के जैसा ॥
वो जब हंसे लगे मोतियों ने एक धार बनाई !
उसके रोने पर मेरी धडकन रूक जाये !
और जब मेरी ये नजरे उससे मिल जायें;
वही उड़ रहे काले बादल में वो छिप जाये
फिर कभी -2 खिडकी के पीछे जाके हंसती है ;
और वहीं उसी ओट से मुझको तकती है ।
पर ऐ दोस्त, कलम !
सच टूटा और रूठा सा
मेरे आंगन के एक सूखे से पौधे सा ।
चांद मिला था ,थी पूरनमासी,
उस दिन था वो पूरा !
अगले दिन ही काटा हिस्सा ।
हुआ चांद अधूरा ॥
फिर मावस की काली छाया
एक दिन आ जाती है !
दीवाने के पास सिर्फ कुछ
यादें रह जाती है....॥
दूर बैठ के बस इतना कहता ।
पत्थर की मूरत मे कोई घाव नहीं होता है
इंसानो की तकदीरों मे चांद नही होता है ।
था उसका ही चेहरा ।
फिर भी कोई समझ न पाया ,
यह पागल क्या लिख बैठा !
बेलगाम थी कलम ;
कलम हंस-2 कर बोली ।
किधर चली “भ्रमर” तेरे नयनो की डोरी,
कहां खोये हो इधर न कोई कन्या,काशी;
या फिर तुम भी बतला दो वो बात जरा सी ॥
क्यों राते अब दिन को, और दिन अब रात बुलायें ।
मन ही मन मे पगले क्यों तू मुस्काये !
पतझड की पत्ते भी,तुझको फूल दिखे हैं !
राहों के थे जो सब दुश्मन ,अब दोस्त लगे हैं
वो काले बादल तक अब कुछ-2 छटा बिखेरे !
बुझे दिये की कालिख से तू क्यों नयना जोडे !
और दर्पण से बात करे फिर चुप हो जाये ।
कांपे तेरे होंठ ,मगर दिल मुस्काये ॥
झूठ अगर कह्ती हूँ तो मै चलती चलती रूक जाऊंगी
और अगर हूँ सच्ची तो तुझसे कुछ सुनकर जाऊंगी ॥
जो कहना था कलम ,कलम खिल-2 कर बोली ;
लगा चिढाने आई हो स्याही बनके एक छोरी !!
मै बोला........
हाँ सुन !
मुझको भी चांद मिला है ।
कई दिनो से छ्त के ऊपर ,
खिला –खिला है ॥
रात बेबफा खो जाती है फिर भी दिखता है ,
सुबह-2 सागर की लहरों पर वो चलता है ॥
उसके चेहरे पर भी है एक दाग जरा सा ।
श्वेत गुलाब पर बैठे ,एक भंवरे के जैसा ॥
वो जब हंसे लगे मोतियों ने एक धार बनाई !
उसके रोने पर मेरी धडकन रूक जाये !
और जब मेरी ये नजरे उससे मिल जायें;
वही उड़ रहे काले बादल में वो छिप जाये
फिर कभी -2 खिडकी के पीछे जाके हंसती है ;
और वहीं उसी ओट से मुझको तकती है ।
पर ऐ दोस्त, कलम !
सच टूटा और रूठा सा
मेरे आंगन के एक सूखे से पौधे सा ।
चांद मिला था ,थी पूरनमासी,
उस दिन था वो पूरा !
अगले दिन ही काटा हिस्सा ।
हुआ चांद अधूरा ॥
फिर मावस की काली छाया
एक दिन आ जाती है !
दीवाने के पास सिर्फ कुछ
यादें रह जाती है....॥
दूर बैठ के बस इतना कहता ।
पत्थर की मूरत मे कोई घाव नहीं होता है
इंसानो की तकदीरों मे चांद नही होता है ।
Thursday, January 11, 2007
उम्मीद..॥
उम्मीद
लेखक :-भ्रमर कुमार
31 दिसम्बर 2005,एक बार फिर धुंध से भरी हुई सर्द रात,कोहरे ने धरती तो कुछ इस तरह अपने आगोश में लिया कि लगा प्रकृति की सफेद रजाई ने पूरे आसमान को ढक लिया हो और उस रजाई के बाहर की यह धरती........बिना बोले सामना कर रही है कडाके की सर्दी का । हड्डियों को गला देने वाली ठंडी हवाओं को भी अपना वीभत्स रूप
आज ही दिखाना था । प्रकृति ने अपनी करवट से प्राणियों को ठहर जाने के लिए कह दिया..! लेकिन धन्य हो मनुष्य.....जिसने समय बनाया और इस समय को आदेश दिया कि कभी किसी को ठहरने मत दो।समय के उसी धुरी पर क्षण ,दिन ,महीने और साल बीते ।और आज फिर आया एक नये साल के आने का जश्न ........। तो क्या हुआ कि प्रकृति जश्न मनाने से रोक रही है। मौसम से 2-2 हाथ करने को हम शहरवासी बिल्कुल तैयार हैं...हमारे पास तेज सुर में बजता संगीत है ,रंग-बिरंगी गर्म पोशाकें है,खुशी जाहिर करने के लिए पटाखे हैं,रोशनी की जगमगाहट है ;माहौल को मदहोश करने के लिये विह्स्की के जाम और थिरकते हुए कुछ खूबसूरत इंसान । शायद अंदर से आत्मिक दुख हैं फिर भी मन तो खुश है..हमें हंसाने के लिये तरह तरह के specialist लाये गये हैं। हम दो मिलकर किसी तीसरे पर जोर-2 से हंसते हैं।
बाहर का एक इंसान अचानक से बेतुका सा प्रश्न कर बैठा
----क्या बात है भाई साहब ! बडे खुश नजर आ रहे हो ?
अचानक 30 तारीख तक चेहरे के साथ चलने वाला तनाव ,31 की रात आते ही न जाने कहाँ ,कब गायब हुआ । यह गायब हुआ है या दिखाई नही दे रहा ? या फिर हम नजर उठा कर उस तरफ देखना नहीं चाह्ते ?
----भाई साब खुश क्यो नही होंगे...नया साल जो आ रहा है।और इसी के साथ आ रही है एक आम आदमी की उम्मीद ..कि जैसे आज खुश हैं सारे साल रहें । युंही हंसते –खेलते ,नाचते गुनगुनाते वक्त बीत जाये।
और फिर अगर अगर इसी उम्मीद पर जिंदगी के कुछ पल हंसी से गुजार दिये जाये तो फिर इसकी फिक्र किसे ????
31 दिसम्बर 2006;एक बार फिर कोहरे की सर्द बूंदे कुछ ज्यादा ही सर्द हो चुकी हैं । अंधेरा इतना कि लगा ईश्वर के दिये के नीचे की कालिख यहीं किसी सतह पर जम गयी हो । निशब्द सन्नाटे के बीच कभी -2 कुत्तो के भौंखने की आवाज ,वक्त वही रात के 11 बजकर 30 मिनट का ; किसानों का एक झुरमुट कम्बल के अभाव में आग तापता हुआ ,और साथ ही कोसो दूर शहर की रोशनी की ओर टकटकी लगाकर देखते हुए..
उनमें से कुछ युवा भाग्य की लकीरों को दोषी बता रहे हैं तो कुछ वृद्ध इसी को पूर्व जन्म के पापों का फल और शहर वालों के पूर्व जन्म के पुण्य का परिणाम। आंगन में जलती हुई एक मिट्टी के तेल की कुप्पी अपने पूरे सामर्थ से हवा के साथ जंग लड रही है....परंतु गांवो में हमेशा की तरह एक बार फिर पवन का प्रहार रोशनी पर भारी पडा और दिया बुझ गया ...।
दूर शहर में एक जोर के पटाखे ने गांव की एक अनपढ बुढिया को जगा दिया ..
-------“लागत है चोर आई गए....गोली दागी राहे “
बुढिया संशय भरे भाव में बोली.
----चुप्पै सोई जाओ चाची ......नया साल शुरू हुआ ताहि तो पटाखा जलो है शहर में.।
बुढिया फिर कम्बल मे लिपटकर टूटे हुए खटोले पर सो गयी ....अचानक से फिर वही पुराना सन्नाटा ,फिर वही निशब्द वातावरण ,न नये साल की कोई मुबारकबाद ,न ही खुशी का कोई माहौल । नींद न आते हुए भी मैने कम्बल के पीछे अपना पूरा चेहरा छुपा लिया।
“ऐसा ही होता है जब उम्मीदें भी जल कर खाक हो चुकी होती हैं और लोग अगले बरस की बजाये अगले जन्म का इंतजार करते हैं “
लेखक :-भ्रमर कुमार
31 दिसम्बर 2005,एक बार फिर धुंध से भरी हुई सर्द रात,कोहरे ने धरती तो कुछ इस तरह अपने आगोश में लिया कि लगा प्रकृति की सफेद रजाई ने पूरे आसमान को ढक लिया हो और उस रजाई के बाहर की यह धरती........बिना बोले सामना कर रही है कडाके की सर्दी का । हड्डियों को गला देने वाली ठंडी हवाओं को भी अपना वीभत्स रूप
आज ही दिखाना था । प्रकृति ने अपनी करवट से प्राणियों को ठहर जाने के लिए कह दिया..! लेकिन धन्य हो मनुष्य.....जिसने समय बनाया और इस समय को आदेश दिया कि कभी किसी को ठहरने मत दो।समय के उसी धुरी पर क्षण ,दिन ,महीने और साल बीते ।और आज फिर आया एक नये साल के आने का जश्न ........। तो क्या हुआ कि प्रकृति जश्न मनाने से रोक रही है। मौसम से 2-2 हाथ करने को हम शहरवासी बिल्कुल तैयार हैं...हमारे पास तेज सुर में बजता संगीत है ,रंग-बिरंगी गर्म पोशाकें है,खुशी जाहिर करने के लिए पटाखे हैं,रोशनी की जगमगाहट है ;माहौल को मदहोश करने के लिये विह्स्की के जाम और थिरकते हुए कुछ खूबसूरत इंसान । शायद अंदर से आत्मिक दुख हैं फिर भी मन तो खुश है..हमें हंसाने के लिये तरह तरह के specialist लाये गये हैं। हम दो मिलकर किसी तीसरे पर जोर-2 से हंसते हैं।
बाहर का एक इंसान अचानक से बेतुका सा प्रश्न कर बैठा
----क्या बात है भाई साहब ! बडे खुश नजर आ रहे हो ?
अचानक 30 तारीख तक चेहरे के साथ चलने वाला तनाव ,31 की रात आते ही न जाने कहाँ ,कब गायब हुआ । यह गायब हुआ है या दिखाई नही दे रहा ? या फिर हम नजर उठा कर उस तरफ देखना नहीं चाह्ते ?
----भाई साब खुश क्यो नही होंगे...नया साल जो आ रहा है।और इसी के साथ आ रही है एक आम आदमी की उम्मीद ..कि जैसे आज खुश हैं सारे साल रहें । युंही हंसते –खेलते ,नाचते गुनगुनाते वक्त बीत जाये।
और फिर अगर अगर इसी उम्मीद पर जिंदगी के कुछ पल हंसी से गुजार दिये जाये तो फिर इसकी फिक्र किसे ????
31 दिसम्बर 2006;एक बार फिर कोहरे की सर्द बूंदे कुछ ज्यादा ही सर्द हो चुकी हैं । अंधेरा इतना कि लगा ईश्वर के दिये के नीचे की कालिख यहीं किसी सतह पर जम गयी हो । निशब्द सन्नाटे के बीच कभी -2 कुत्तो के भौंखने की आवाज ,वक्त वही रात के 11 बजकर 30 मिनट का ; किसानों का एक झुरमुट कम्बल के अभाव में आग तापता हुआ ,और साथ ही कोसो दूर शहर की रोशनी की ओर टकटकी लगाकर देखते हुए..
उनमें से कुछ युवा भाग्य की लकीरों को दोषी बता रहे हैं तो कुछ वृद्ध इसी को पूर्व जन्म के पापों का फल और शहर वालों के पूर्व जन्म के पुण्य का परिणाम। आंगन में जलती हुई एक मिट्टी के तेल की कुप्पी अपने पूरे सामर्थ से हवा के साथ जंग लड रही है....परंतु गांवो में हमेशा की तरह एक बार फिर पवन का प्रहार रोशनी पर भारी पडा और दिया बुझ गया ...।
दूर शहर में एक जोर के पटाखे ने गांव की एक अनपढ बुढिया को जगा दिया ..
-------“लागत है चोर आई गए....गोली दागी राहे “
बुढिया संशय भरे भाव में बोली.
----चुप्पै सोई जाओ चाची ......नया साल शुरू हुआ ताहि तो पटाखा जलो है शहर में.।
बुढिया फिर कम्बल मे लिपटकर टूटे हुए खटोले पर सो गयी ....अचानक से फिर वही पुराना सन्नाटा ,फिर वही निशब्द वातावरण ,न नये साल की कोई मुबारकबाद ,न ही खुशी का कोई माहौल । नींद न आते हुए भी मैने कम्बल के पीछे अपना पूरा चेहरा छुपा लिया।
“ऐसा ही होता है जब उम्मीदें भी जल कर खाक हो चुकी होती हैं और लोग अगले बरस की बजाये अगले जन्म का इंतजार करते हैं “
Wednesday, October 04, 2006
बुरा करो ,बुरा देखो और बुरा सोचो
gadhya
गांधी जंयती पर विशेष
“बुरा करो; बुरा सोचो; बुरा देखो”.... (लेखक-पवन कुमार “भ्रमर”)
अक्सर कुछ मानवीय विचारधारा के लोग सदा संदर्भित व्याख्या के साथ मुझसे मानविकी पर विचार करने के लिये चले आते हैं और मै भी विना किसी संकोच के उन सब को मानविकी के के बडे-2 लेक्च्रर देने लगता हूँ ।
आज का विषय था “बुराई करना”। यहाँ बुराई करने का तात्पर्य सिर्फ पीठ पीछे बुराई करने से है।भाषा में कमजोर लोगों को बताना चाहूंगा कि चुगली करना;ख़ुन्न्श निकालना;वचन बदलना (धातु की अनुपस्थिति में और उपयुक्त समय देखकर) भी इसी इसी विशिष्ट कला के प्रारूप हैं।
जिस समय ईश्वर प्रक्रति के जीव-जंतुओ का निर्माण कर रहा था;उसने प्राणियों की पाचन व्यवस्था का भी पूरा ध्यान रखा ।भैस ,गाय ,गधा ,उँट,बकरी को खाना खाने के बाद जिस प्रकार “जुगाली” करने की प्राकृतिक व्यवस्था दी गई;ठीक उसी प्रकार मनुष्यों को चुगली करने की। आप अक्सर खाने के बाद अपने आप को सहपाठी ,सह्चर,पडोसी,बॉस की बुराई करते हुए पाऎगें।
दरअसल “चुगली करना” भी अपने आप में अत्यंत आन्नददायक विषयवस्तु है।जिस प्रकार माँ अपने सफल बेटे को देखकर ,पिता अपने कर्तव्यों को पूर्ण होता देखकर,बहनें रक्षाबन्धन का उपहार देखकर,और अंग्रेज हिन्दुस्तान जैसे देशों को आजाद करके हार्दिक प्रसन्न होते हैं ,ठीक उसी प्रकार चुगलखोर अपनी चुगली भरी बातों में दूसरों को फंसाकर खुश होते हैं। “वास्तविकता में चुगलखोर वह है जो यह जानता है कि जिन सिद्धांतो का वह उपदेश दे रहा है वे झूठे हैं तथा जो लोग उसे सुन रहे हैं वो महामूर्ख हैं ।“ चुगली करने से प्राप्त हुए असीम आनन्द को वह व्यक्ति कभी नहीं प्राप्त कर सकता जिसने जिन्दगी में कभी भी चुगली न की हो ।
यहाँ मेरा “मन की भडास” और “चुगली” के अंतर को स्पष्ट करना बहुत आवश्यक हो गया है।वास्तव में “मन की भडास” निकालना अपने मन को शांत करने के लिये किया जाता है।इसमें कहीं न कहीं स्वार्थ अवश्य होता है परन्तु “चुगली” तो निश्वार्थ रूप से की जाती है ।हम दूसरो की बुराई उस समय भी कर सकते हैं जबकि हमें उससे कोई लाभ न हो रहा हो ।
वैसे तो “चुगली करना” ही पूर्णरूपेण प्राकृतिक क्रिया है परन्तु इनमे भी कुछ लोगो की चुगली करना” Basics सीखने जैसा है।बच्चा अपने भाई बहनो की चुगली ;किशोर का अपने अध्यापक की चुगली ,युवावस्था में “गर्लफ़्रेड युक्त” साथियो की “गर्लफ़्रेड रहित” साथियों द्वारा चुगली ;नौकरी मे बॉस की चुगली ; रिटायरमेंट के बाद पत्नी की चुगली ;और म्रत्यु समीप देखकर भगवान की चुगली करना एक अछ्छे चुगलखोर के सफल सफर में पडने वाली सीढियां है।
अब इससे आगे भी पढ्ने की या फिर सुनने की इछ्छा हो रही है तो बस इतना कहूंगा कि “अछ्छे अवसर बार -2 नही आते”।सुबह उठते ही डायरी में रूटीन वर्क बना लें कि आज किसकी,कम से कम कितने लोगों के सामने चुगली करनी है।आखिरकार आप भी तो इस “कलयुग” के काले भद्र पुरूष है और आपका भी परम कर्तव्य है कि आप भी “बुरा करो; बुरा सोचो; बुरा देखो”....को युक्तिसंगत बनायें.।
गांधी जंयती पर विशेष
“बुरा करो; बुरा सोचो; बुरा देखो”.... (लेखक-पवन कुमार “भ्रमर”)
अक्सर कुछ मानवीय विचारधारा के लोग सदा संदर्भित व्याख्या के साथ मुझसे मानविकी पर विचार करने के लिये चले आते हैं और मै भी विना किसी संकोच के उन सब को मानविकी के के बडे-2 लेक्च्रर देने लगता हूँ ।
आज का विषय था “बुराई करना”। यहाँ बुराई करने का तात्पर्य सिर्फ पीठ पीछे बुराई करने से है।भाषा में कमजोर लोगों को बताना चाहूंगा कि चुगली करना;ख़ुन्न्श निकालना;वचन बदलना (धातु की अनुपस्थिति में और उपयुक्त समय देखकर) भी इसी इसी विशिष्ट कला के प्रारूप हैं।
जिस समय ईश्वर प्रक्रति के जीव-जंतुओ का निर्माण कर रहा था;उसने प्राणियों की पाचन व्यवस्था का भी पूरा ध्यान रखा ।भैस ,गाय ,गधा ,उँट,बकरी को खाना खाने के बाद जिस प्रकार “जुगाली” करने की प्राकृतिक व्यवस्था दी गई;ठीक उसी प्रकार मनुष्यों को चुगली करने की। आप अक्सर खाने के बाद अपने आप को सहपाठी ,सह्चर,पडोसी,बॉस की बुराई करते हुए पाऎगें।
दरअसल “चुगली करना” भी अपने आप में अत्यंत आन्नददायक विषयवस्तु है।जिस प्रकार माँ अपने सफल बेटे को देखकर ,पिता अपने कर्तव्यों को पूर्ण होता देखकर,बहनें रक्षाबन्धन का उपहार देखकर,और अंग्रेज हिन्दुस्तान जैसे देशों को आजाद करके हार्दिक प्रसन्न होते हैं ,ठीक उसी प्रकार चुगलखोर अपनी चुगली भरी बातों में दूसरों को फंसाकर खुश होते हैं। “वास्तविकता में चुगलखोर वह है जो यह जानता है कि जिन सिद्धांतो का वह उपदेश दे रहा है वे झूठे हैं तथा जो लोग उसे सुन रहे हैं वो महामूर्ख हैं ।“ चुगली करने से प्राप्त हुए असीम आनन्द को वह व्यक्ति कभी नहीं प्राप्त कर सकता जिसने जिन्दगी में कभी भी चुगली न की हो ।
यहाँ मेरा “मन की भडास” और “चुगली” के अंतर को स्पष्ट करना बहुत आवश्यक हो गया है।वास्तव में “मन की भडास” निकालना अपने मन को शांत करने के लिये किया जाता है।इसमें कहीं न कहीं स्वार्थ अवश्य होता है परन्तु “चुगली” तो निश्वार्थ रूप से की जाती है ।हम दूसरो की बुराई उस समय भी कर सकते हैं जबकि हमें उससे कोई लाभ न हो रहा हो ।
वैसे तो “चुगली करना” ही पूर्णरूपेण प्राकृतिक क्रिया है परन्तु इनमे भी कुछ लोगो की चुगली करना” Basics सीखने जैसा है।बच्चा अपने भाई बहनो की चुगली ;किशोर का अपने अध्यापक की चुगली ,युवावस्था में “गर्लफ़्रेड युक्त” साथियो की “गर्लफ़्रेड रहित” साथियों द्वारा चुगली ;नौकरी मे बॉस की चुगली ; रिटायरमेंट के बाद पत्नी की चुगली ;और म्रत्यु समीप देखकर भगवान की चुगली करना एक अछ्छे चुगलखोर के सफल सफर में पडने वाली सीढियां है।
अब इससे आगे भी पढ्ने की या फिर सुनने की इछ्छा हो रही है तो बस इतना कहूंगा कि “अछ्छे अवसर बार -2 नही आते”।सुबह उठते ही डायरी में रूटीन वर्क बना लें कि आज किसकी,कम से कम कितने लोगों के सामने चुगली करनी है।आखिरकार आप भी तो इस “कलयुग” के काले भद्र पुरूष है और आपका भी परम कर्तव्य है कि आप भी “बुरा करो; बुरा सोचो; बुरा देखो”....को युक्तिसंगत बनायें.।
Saturday, August 05, 2006
मै और मेरा प्रधानमंत्री पद
जो लोग मुझे काफी करीब से जानते हैं ,(यधपि ऐसे मूर्ख काफी कम है),उन्हे यह पता है कि मै “नेता” बल्कि सही कहें तो “नेताजी” के नाम से अधिक प्रसिद्ध हूँ ।यह नाम मुझे उस समय तथाकथित मित्रों द्वारा मिला जो अक्सर मेरे “रंग दे बसंती” के रंगीन विचारों को सुन-सुन कर तँग आ गये थे।उन कमीने दोस्तों ने तो सजा दे दी परंतु मै चार वर्षों तक इस सोच मे पडा रहा कि आखिर मुझे यह नाम क्यूँ मिला ?
परंतु जिस प्रकार बुद्ध को सारनाथ मे ज्ञान प्राप्त हुआ ;महावीर स्वामी को कुशीनगर मे जीवन की सत्यता के बारे मे पता चला ;ठीक उसी प्रकार मुझे सरकारी कँपनी मेँ आते ही ज्ञान प्राप्त हो गया ।एक कहावत है कि पवन ,पानी और प्रतिभा अपना रास्ता खुद खोज लेते हैं ।पवन मेरा ही पयार्य है ,पानी मै खूब पीता हूँ और प्रतिभा मुझ में कूट -2 के भरी हुई है।मैने सरकारी कंपनी मे आते ही उक्ति को चरितार्थ किया और कँपनी की युनियन को खोजना प्रारँभ कर दिया ।लोगो ने हमसे हमारा परिचय पूछा ।हमने क्या कहा यह बाद की बात है पर पहले मै हर सफल व्यक्ति के तीन विशिष्ट गुण बताना चाहूंगा----
1-अच्छा वाचक
2-अच्छा स्रोता
3-अच्छा प्रसशंक
अच्छा वाचक :-बात सीधे न कह्कर घुमा फिरा कर कहना चाहिए ।यदि आंग्ल भाषा पर नियंत्रण हो तो सोने पर सुहागा .....क्योकि सुनने वाले 10% ही आपको समझ सकेंगे कि आपने क्या कहा बाकि के 90% आपकी आवाज और भावभंगिमा देखकर एक दूसरे से खुद को ज्यादा बुद्धिमान दिखाने के लिये कहेगे “इटस एक्सीलेंट”
अच्छा स्रोता :बहुत जरूरी है ! क्यूँ ??? जरा नम्बर 3 पढे ।
अच्छा प्रशंसक :-जिन्हे भाषा का कम ज्ञान है या जो अक्सर नकारात्मक प्रवत्ति से घिरे रह्ते है वो मेरे प्रशंसक शब्द को “चापलूस” में बदल देंगे ।परंतु अगर आप प्रगति के इछ्छुक हैं तो आप अपने से ऊपर वाले की जमकर प्रशंसा करिये । स्त्रियों से कहें कि वो बुद्धिमान है और पुरुषों से कहे कि वो लगातार handsome होते जा रहे है।आपके मुख से ऐसे वचन सुनकर वो ठीक उसी प्रकार प्रसन्न होंगे जिस प्रकार रामदेव महाराज अपनी दवा के बारे में,ग्रेग चैपल उंगली दिखाने में ,सिद्धू जी बिना अर्थ की लोकोक्त्ति सुनाने में ;और वित्त मंत्री कीमते बढाने में खुश होते हैं।
अब लोगो ने जैसे ही मेरा परिचय पूछा हमने तपाक से एक शेर जड दिया: बोले
“हम न गुल हैं न फूल है जो महकते जायें
आग की तरह है जिधर जाये दह्कते जायें ॥
इतना कहते ही 2000 रु प्रतिमाह पाने वाले मजदूर संकट्मोचक मुझे ही समझ बैठे ।परन्तु मेरे लिये यह कूटनीति का प्रथम चरण था ।मुझे जार्ज रेमँड की अग्रेजी पुस्तक की दो लाइने आज तक याद हैँ
“कूटनीतिज्ञ एक ऐसा राजनीतिज्ञ है जो स्वयँ को राष्र्ट्र की सेवा में अर्पित कर देता है; जबकि राजनीतिज्ञ एक ऐसा कूटनीतिज्ञ है जो राष्ट्र को अपनी सेवा में अर्पित कर देता है.”
कुल मिलाकर यदि मेरे उपर्युक्त कथन की विवेचना की जाये और समझा जाये तो मेरे लिये राष्ट्र आदि के कोई मायने नहीं है।मै मनुष्यों द्वारा बनाई गई रेखाओं को ठीक उसी प्रकार नही समझ सकता जैसे एक टेक्निकल concept को मैनेजमेंट की कुर्सी पर बैठा इँसान नही समझ सकता ।
खुद को बदलने से मोह्ल्ला बदल जाता है ;मोह्ल्ला बदलने से गाँव;और गाँव बदलने से देश बदल जाता है ;ठीक उसी प्रकार से अपनी प्रगति से मोहल्ले की प्रगति;मोह्ल्ले से गांव और गांव से देश की प्रगति हो जायेगी ।मूल मे अपनी प्रगति अतिआवश्यक है।कुल मिलाकर “स्वकेन्द्रीय सोच “अर्थात स्वार्थी होना ही प्रगति करने का मूल स्तम्भ है।
मजदूर यूनियन में अध्यक्ष पद संभालते ही मैने एक शब्द रटा और उनके दो समर्थक नेताओं के नाम रटे ।शब्द था “समाजवाद “और नेता थे “मार्क्स और लेनिन”।ध्यान रहे भारतीय “लोहिया” ;”गांधी” या “विनोवा “ का नाम लेना ,मतलब जनता कि नजरों मे स्वंय के स्तर को गिराना।जब तक आपकी बातों मे “राविंसन “”मैल्कम स्मिथ “”रिलैरो मैक्सम” या इससे भी अधिक कठिन नाम नही आते ,लोगो के सामने आपके विचारो की कोई औकात नहीं ।एक और विशिष्ट बात वह यह कि आप अपनी बात को कुछ अधिक कलात्मक,विचारपरक प्रदर्शित करना चाह्ते हैं तो आप अपने नाम के आगे “सर” और पीछे “बंशाली”,”चटर्जी “,”दास” “चट्टोपाध्याय “ या फिर “गंगोपाध्याय “ लगाना प्रारंभ कर दें।
एक अच्छे नेता का प्रथम कार्य होता है “किसी अच्छी सी सडक पर जाम लगबाना “ या फिर किसी भिखारी के तन पर ढके एक मात्र वस्त्र को छींनकर उस कपडे का पुतला बनाकर उसे जलाना ।पुतला जितने बडे आदमी का जलायेगे आप भी उतनी ज्यादा प्रसिद्धि पायेंगे।
लेकिन मैने तो प्रसिद्धि पाने का एक अलग ही तरीका अपनाया ।मैने एक मरे हुए अति प्रसिद्ध आदमी का पुतला जलाया ।यह प्रसिद्ध आदमी “गांधी “था ।वैसे भी यह वो बेचारा इँसान था जिसने पूरी जिन्दगी खुद को खूब जलाया और हिन्दुस्तानी जनता देश की सबसे बडी समस्या का उत्तरदायी इसे ही मानती है ।जनता की इसी “मूर्खता” का मैने जमकर फायदा उठाया ।यहाँ एक और शिक्षा देना चाहूँगा ;अगर जिन्दगी में कभी कोई गलती हो जाये तो उसे कभी मत स्वीकारो ;कभी मत कहो कि गलती मेरी या हमारी थी ।
कहना सीखो कि गलती उसकी थी ;या ISI की थी ;पाकिस्तान की थी ,और अगर कोई ना मिले तो “गांधी”की थी।कुल मिलाकर आदर्शवादी गांधी का मैने जमकर फायदा उठाया।
मैने यह सारे मंत्र सीख लिये और अपनी युनियन के साथ बाहर की युनियन कार्य में भी बढ-चढ कर भाग लेना प्रारंभ कर दिया था;गाँधी जी से खुले आम दुश्मनी ने मुझे बहुत प्रसिद्ध कर ही दिया था ।मुझे किसी भी बात का डर भी नही था क्योंकि मेरे दुश्मन “अहिंसक” थे ।
मेरे जबरदस्त विचारों से प्रेरित होकर कुछ महापुरुषों ने मुझे “वर्तमान का सिपाही” की होने की संज्ञा दे डाली;और आगामी लोकसभा में चुनाव लडने का विचार ।मै प्रथमता नैतिकता के आधार पर बोला कि मै देश के इतने बडे भवन में बैठने लायक कहाँ हूँ परंतु मेरे इस कथन को वो सत्य ना मान ले इसलिए साथ ही जोडा कि आप बुद्धिमान है ;जो आप ठीक समझते है वही उचित होगा।वैसे सत्य कहूँ तो उतना मूर्ख राजनीतिज्ञ मैने आज तक नही देखा ;15 वर्षो से सिर्फ पार्टी का स्यंयसेवक बना बैठा था।कोई लाभ का पद मिलते ही उसे ठुकरा देता..........।मै मन ही मन अति प्रसन्न था।
अब मैने जाते ही अपनी कंपनी मे अपने इस्तीफे की कयावत प्रारंभ कर दी;इसके लिये सर्वप्रथम मैने एक बडा घोटाला किया;उददेश्य था आगामी चुनावों के लिए पैसे जुगाडना।ळोगो ने जैसे ही मेरे ऊपर प्रश्न किये मैने घडियाली आसूँ बहाते हुए इस्तीफा दे दिया। युनियन पहले से ही मेरे साथ थी ।कंपनी मे हड्ताल शुरू हो गयी।मै चार दिन बाद प्रेस से मिला और साथियो से काम पर बापस जाने का आह्वान किया ।
लोगों ने मेरी बात मानी पर साथ ही साथ एक नारा भी दिया ;”छछूदंरलाल तुम सँघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं “मैने भी साथ में कह दिया आपके इस साथ की जरुरत समय आने पडेगी ।
अब चुनावों का समय पास था । साम,दाम,दण्ड भेद की सारी नीतियाँ मैने अपना ली थी।अपने चुनावी अभियान की शुरुआत मैने जुग्घी-झोपडी में राखी सावंत का बहुमुखी न्रत्य करा किया;मै जांनता था कि 90% वोट यहीं से पडेंगे ।वैसे भी मै कला का बहुत
बडा प्रसशंक हूँ।
अंतत: मै चुनाव जीत ही गया ;मेरे साथ मेरे मुहल्ले का रामविलास और बगल वाले मुह्ल्ले का सिबू भी चुनाव जीता था। दोनो निर्दलीय थे इसलिए सबसे पहले इन दोनो को मैने अपनी पार्टी में ले लिया;बैसे इन दोनो का पूर्व मे किसी की भी सरकार में कैबिनेट मंत्री का पद पक्का रह्ता था।अब हम तीन थे “रामविलास,सिब्बु जी;और छ्छूंदरलाल”....
मैने पार्टी का नाम तीनो नामो को जोडते हुए रखा “लाल राम जी”।सयोंग से इस बार त्रिद्लीय संसद बनी ।दो बडे-2 दल बहुमत से दूर थे ,बाकियों को जोड्ने से बहुमत से सिर्फ 3 कम ।मै अपनी value समझ चुका था ।मैने छोटे-2 दलों को दिवास्व्प्न दिखाने शुरु किये और उन्होने देखने ।मैने सभी को मंत्री बनाने का वायदा कर डाला।और संसद में खुद की अध्यक्षता में सबसे बडी पार्टी की लिस्ट राष्ट्र्पति को पकडा दी।
अब शपथ समारोह और हमारे प्रधानमंत्री बनने में दो दिन का अंतर था............॥आगे की सुखद या दुखद घटना अगले अंक मे......................॥
परंतु जिस प्रकार बुद्ध को सारनाथ मे ज्ञान प्राप्त हुआ ;महावीर स्वामी को कुशीनगर मे जीवन की सत्यता के बारे मे पता चला ;ठीक उसी प्रकार मुझे सरकारी कँपनी मेँ आते ही ज्ञान प्राप्त हो गया ।एक कहावत है कि पवन ,पानी और प्रतिभा अपना रास्ता खुद खोज लेते हैं ।पवन मेरा ही पयार्य है ,पानी मै खूब पीता हूँ और प्रतिभा मुझ में कूट -2 के भरी हुई है।मैने सरकारी कंपनी मे आते ही उक्ति को चरितार्थ किया और कँपनी की युनियन को खोजना प्रारँभ कर दिया ।लोगो ने हमसे हमारा परिचय पूछा ।हमने क्या कहा यह बाद की बात है पर पहले मै हर सफल व्यक्ति के तीन विशिष्ट गुण बताना चाहूंगा----
1-अच्छा वाचक
2-अच्छा स्रोता
3-अच्छा प्रसशंक
अच्छा वाचक :-बात सीधे न कह्कर घुमा फिरा कर कहना चाहिए ।यदि आंग्ल भाषा पर नियंत्रण हो तो सोने पर सुहागा .....क्योकि सुनने वाले 10% ही आपको समझ सकेंगे कि आपने क्या कहा बाकि के 90% आपकी आवाज और भावभंगिमा देखकर एक दूसरे से खुद को ज्यादा बुद्धिमान दिखाने के लिये कहेगे “इटस एक्सीलेंट”
अच्छा स्रोता :बहुत जरूरी है ! क्यूँ ??? जरा नम्बर 3 पढे ।
अच्छा प्रशंसक :-जिन्हे भाषा का कम ज्ञान है या जो अक्सर नकारात्मक प्रवत्ति से घिरे रह्ते है वो मेरे प्रशंसक शब्द को “चापलूस” में बदल देंगे ।परंतु अगर आप प्रगति के इछ्छुक हैं तो आप अपने से ऊपर वाले की जमकर प्रशंसा करिये । स्त्रियों से कहें कि वो बुद्धिमान है और पुरुषों से कहे कि वो लगातार handsome होते जा रहे है।आपके मुख से ऐसे वचन सुनकर वो ठीक उसी प्रकार प्रसन्न होंगे जिस प्रकार रामदेव महाराज अपनी दवा के बारे में,ग्रेग चैपल उंगली दिखाने में ,सिद्धू जी बिना अर्थ की लोकोक्त्ति सुनाने में ;और वित्त मंत्री कीमते बढाने में खुश होते हैं।
अब लोगो ने जैसे ही मेरा परिचय पूछा हमने तपाक से एक शेर जड दिया: बोले
“हम न गुल हैं न फूल है जो महकते जायें
आग की तरह है जिधर जाये दह्कते जायें ॥
इतना कहते ही 2000 रु प्रतिमाह पाने वाले मजदूर संकट्मोचक मुझे ही समझ बैठे ।परन्तु मेरे लिये यह कूटनीति का प्रथम चरण था ।मुझे जार्ज रेमँड की अग्रेजी पुस्तक की दो लाइने आज तक याद हैँ
“कूटनीतिज्ञ एक ऐसा राजनीतिज्ञ है जो स्वयँ को राष्र्ट्र की सेवा में अर्पित कर देता है; जबकि राजनीतिज्ञ एक ऐसा कूटनीतिज्ञ है जो राष्ट्र को अपनी सेवा में अर्पित कर देता है.”
कुल मिलाकर यदि मेरे उपर्युक्त कथन की विवेचना की जाये और समझा जाये तो मेरे लिये राष्ट्र आदि के कोई मायने नहीं है।मै मनुष्यों द्वारा बनाई गई रेखाओं को ठीक उसी प्रकार नही समझ सकता जैसे एक टेक्निकल concept को मैनेजमेंट की कुर्सी पर बैठा इँसान नही समझ सकता ।
खुद को बदलने से मोह्ल्ला बदल जाता है ;मोह्ल्ला बदलने से गाँव;और गाँव बदलने से देश बदल जाता है ;ठीक उसी प्रकार से अपनी प्रगति से मोहल्ले की प्रगति;मोह्ल्ले से गांव और गांव से देश की प्रगति हो जायेगी ।मूल मे अपनी प्रगति अतिआवश्यक है।कुल मिलाकर “स्वकेन्द्रीय सोच “अर्थात स्वार्थी होना ही प्रगति करने का मूल स्तम्भ है।
मजदूर यूनियन में अध्यक्ष पद संभालते ही मैने एक शब्द रटा और उनके दो समर्थक नेताओं के नाम रटे ।शब्द था “समाजवाद “और नेता थे “मार्क्स और लेनिन”।ध्यान रहे भारतीय “लोहिया” ;”गांधी” या “विनोवा “ का नाम लेना ,मतलब जनता कि नजरों मे स्वंय के स्तर को गिराना।जब तक आपकी बातों मे “राविंसन “”मैल्कम स्मिथ “”रिलैरो मैक्सम” या इससे भी अधिक कठिन नाम नही आते ,लोगो के सामने आपके विचारो की कोई औकात नहीं ।एक और विशिष्ट बात वह यह कि आप अपनी बात को कुछ अधिक कलात्मक,विचारपरक प्रदर्शित करना चाह्ते हैं तो आप अपने नाम के आगे “सर” और पीछे “बंशाली”,”चटर्जी “,”दास” “चट्टोपाध्याय “ या फिर “गंगोपाध्याय “ लगाना प्रारंभ कर दें।
एक अच्छे नेता का प्रथम कार्य होता है “किसी अच्छी सी सडक पर जाम लगबाना “ या फिर किसी भिखारी के तन पर ढके एक मात्र वस्त्र को छींनकर उस कपडे का पुतला बनाकर उसे जलाना ।पुतला जितने बडे आदमी का जलायेगे आप भी उतनी ज्यादा प्रसिद्धि पायेंगे।
लेकिन मैने तो प्रसिद्धि पाने का एक अलग ही तरीका अपनाया ।मैने एक मरे हुए अति प्रसिद्ध आदमी का पुतला जलाया ।यह प्रसिद्ध आदमी “गांधी “था ।वैसे भी यह वो बेचारा इँसान था जिसने पूरी जिन्दगी खुद को खूब जलाया और हिन्दुस्तानी जनता देश की सबसे बडी समस्या का उत्तरदायी इसे ही मानती है ।जनता की इसी “मूर्खता” का मैने जमकर फायदा उठाया ।यहाँ एक और शिक्षा देना चाहूँगा ;अगर जिन्दगी में कभी कोई गलती हो जाये तो उसे कभी मत स्वीकारो ;कभी मत कहो कि गलती मेरी या हमारी थी ।
कहना सीखो कि गलती उसकी थी ;या ISI की थी ;पाकिस्तान की थी ,और अगर कोई ना मिले तो “गांधी”की थी।कुल मिलाकर आदर्शवादी गांधी का मैने जमकर फायदा उठाया।
मैने यह सारे मंत्र सीख लिये और अपनी युनियन के साथ बाहर की युनियन कार्य में भी बढ-चढ कर भाग लेना प्रारंभ कर दिया था;गाँधी जी से खुले आम दुश्मनी ने मुझे बहुत प्रसिद्ध कर ही दिया था ।मुझे किसी भी बात का डर भी नही था क्योंकि मेरे दुश्मन “अहिंसक” थे ।
मेरे जबरदस्त विचारों से प्रेरित होकर कुछ महापुरुषों ने मुझे “वर्तमान का सिपाही” की होने की संज्ञा दे डाली;और आगामी लोकसभा में चुनाव लडने का विचार ।मै प्रथमता नैतिकता के आधार पर बोला कि मै देश के इतने बडे भवन में बैठने लायक कहाँ हूँ परंतु मेरे इस कथन को वो सत्य ना मान ले इसलिए साथ ही जोडा कि आप बुद्धिमान है ;जो आप ठीक समझते है वही उचित होगा।वैसे सत्य कहूँ तो उतना मूर्ख राजनीतिज्ञ मैने आज तक नही देखा ;15 वर्षो से सिर्फ पार्टी का स्यंयसेवक बना बैठा था।कोई लाभ का पद मिलते ही उसे ठुकरा देता..........।मै मन ही मन अति प्रसन्न था।
अब मैने जाते ही अपनी कंपनी मे अपने इस्तीफे की कयावत प्रारंभ कर दी;इसके लिये सर्वप्रथम मैने एक बडा घोटाला किया;उददेश्य था आगामी चुनावों के लिए पैसे जुगाडना।ळोगो ने जैसे ही मेरे ऊपर प्रश्न किये मैने घडियाली आसूँ बहाते हुए इस्तीफा दे दिया। युनियन पहले से ही मेरे साथ थी ।कंपनी मे हड्ताल शुरू हो गयी।मै चार दिन बाद प्रेस से मिला और साथियो से काम पर बापस जाने का आह्वान किया ।
लोगों ने मेरी बात मानी पर साथ ही साथ एक नारा भी दिया ;”छछूदंरलाल तुम सँघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं “मैने भी साथ में कह दिया आपके इस साथ की जरुरत समय आने पडेगी ।
अब चुनावों का समय पास था । साम,दाम,दण्ड भेद की सारी नीतियाँ मैने अपना ली थी।अपने चुनावी अभियान की शुरुआत मैने जुग्घी-झोपडी में राखी सावंत का बहुमुखी न्रत्य करा किया;मै जांनता था कि 90% वोट यहीं से पडेंगे ।वैसे भी मै कला का बहुत
बडा प्रसशंक हूँ।
अंतत: मै चुनाव जीत ही गया ;मेरे साथ मेरे मुहल्ले का रामविलास और बगल वाले मुह्ल्ले का सिबू भी चुनाव जीता था। दोनो निर्दलीय थे इसलिए सबसे पहले इन दोनो को मैने अपनी पार्टी में ले लिया;बैसे इन दोनो का पूर्व मे किसी की भी सरकार में कैबिनेट मंत्री का पद पक्का रह्ता था।अब हम तीन थे “रामविलास,सिब्बु जी;और छ्छूंदरलाल”....
मैने पार्टी का नाम तीनो नामो को जोडते हुए रखा “लाल राम जी”।सयोंग से इस बार त्रिद्लीय संसद बनी ।दो बडे-2 दल बहुमत से दूर थे ,बाकियों को जोड्ने से बहुमत से सिर्फ 3 कम ।मै अपनी value समझ चुका था ।मैने छोटे-2 दलों को दिवास्व्प्न दिखाने शुरु किये और उन्होने देखने ।मैने सभी को मंत्री बनाने का वायदा कर डाला।और संसद में खुद की अध्यक्षता में सबसे बडी पार्टी की लिस्ट राष्ट्र्पति को पकडा दी।
अब शपथ समारोह और हमारे प्रधानमंत्री बनने में दो दिन का अंतर था............॥आगे की सुखद या दुखद घटना अगले अंक मे......................॥
Subscribe to:
Posts (Atom)
